बात है सोनम वांगचुक जैसे बुद्धिजीवी, पर्यावरणविद वैज्ञानिक की। बात है चरम पर पहुंच चुके देश के भ्रष्टाचार की। इस देश के नेता इतने बेशर्म हो चुके हैं कि भूख हड़ताल पर बैठे व्यक्ति से बात तक करना जरूरी नहीं समझते और नाच गाने में व्यस्त हैं। ऐसा तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया था कभी। जब सोशल मीडिया नहीं था, टीवी नहीं था तब भी उन्हें इस बात की शर्म थी। और हम कहते हैं कि हम आजाद हैं? ऐसी आजादी से तो वो गुलामी अच्छी थी। प्रदर्शनकारी बच्चों तक पानी भी नहीं जाने दिया जा रहा। पुलिस ने रोक रखा है। बच्चे भूखे प्यासे हैं। कड़ी धूप में पुलिस सोनम वांगचुक के सिर के ऊपर की तिरपाल हटाने आ गई। शांतिपूर्ण प्रदर्शन को ऐसी घटिया हरकतों से दबाया जा रहा है।
यदि सोनम वांगचुक को कुछ होता है तो घर पर चुप बैठना मुश्किल हो जाएगा। मुझे नहीं पता कि इसके बाद मैं अपने को कैसे रोकूंगी। क्या आप तब भी ऐसे ही चुप रह पाएंगे? यदि हां, तो आप बिना भूख हड़ताल के ही मर चुके हैं। यदि आपको ये तानाशाही नजर नहीं आ रही तो आप अंधे हो चुके हैं। यदि आपको भी हर विरोध में गद्दारी दिखाई देती है तो आप सरकार द्वारा बांटी जा रही चरस के आदी हो चुके हैं।
सोनम वांगचुक को मरने मत दीजिए। यदि ऐसा होता है तो आने वाली पीढ़ियां थूकेंगी हम पर। लद्दाख के वो बच्चे हमें अपना दुश्मन मानेंगे जिनका जीवन इस अकेले आदमी ने सँवार दिया है।
जागिये। अपने बच्चों के लिए जागिये। वहां जाइए, खुद लिखिए, बोलिए, दूसरों का लिखा लाइक कीजिए, शेयर कीजिए। कुछ भी करके अपनी आवाज उठाइये इस अन्याय के खिलाफ।