37 वर्ष के संघ जीवन में आज भी परिचय सुभाष प्रभात शाखा.का स्वयंसेवक, हजारों से आत्मीय संबंध बने जिले में प्रवास हुआ, नए पुराने स्वयं सेवकों के घर मकान दुकान व्यवसाय ,भोजन भजन सबमें सम्मिलित हुए,
एक अपनापन आनौचारिक वार्तालाप ,सुख दुख में उपस्थिति उसे जोड़े रहती है।
दैनंदिन शाखा संघ की केवल पद्धति नहीं है प्राण हैनियमित प्रवास ,संपर्क और संवाद इस संघ रूपी शरीर की स्वांस हैं
,कार्यक्रम,बैठक इसके भुजाएं हैऔर मिलन ,मंडली इस शरीर के पैर हैं।
आज जाने क्यों अपाहिज ,विकलांग सा महसूस करता है वह स्वयं सेवक जो वर्षों वर्ष पीढियों से संघ विचार की स्थापना में जीवन गला रहा है।
शाखा - प्राण ,अर्थात नहीं है तो मृत है संघ, फिर वहीं से राजनीति में प्रवेश का मार्ग क्यों खोजते हैं,?
अपने अनुसंग में भाजपा का स्थानीय पदाधिकारी,विधायक, या मंत्री संघ के प्रान्त , विभाग स्तर या खंड संघ चालक स्तर के स्वयंसेवक को दुत्कार देता है,अपमानित कर देता है, विरुद्ध कृत्य करने पर हानि पहुंचाता है ऐसा तो कभी जब सत्ता में भाजपा नहीं थी तब नहीं होता था...
कमोबेश सभी जगह यही हाल है...इसका कारण क्या...
शाखा नहीं आना,अर्थात प्राणदायक वातावरण में समन्वय नहीं होना…..
हमने 2003 से 2018 तक वह भीड़ जोड़ी है सिर्फ राजसत्ता पाने और सत्ता के सुख से स्वयं सुखी होने वाले कार्यकर्ता आज उस सामान्य स्वयंसेवक को निकृष्ट मानते हैं जो 20 वर्ष से बिना रुके विचार के साथ खड़ा है…..
हमने संघ रूपी गंगा में गंदे नालों को मिलकर गंगा बनाने का सोचा किंतु इतना विषाक्त वैचारिक कचरा था इनके प्रवाह में की हमारा जल शुद्धिकरण यंत्र ही खराब हो गया…..और इस समन्वय रूपी यंत्र के दृष्टि पर एक पर्दा पड़ गया है,यह वही कर रहे हैं जो वो करा रहे है,यह वही देख रहे हैं जो वह दिखा रहे हैं……
प्रवास, संपर्क और संवाद
अपने किसी कार्यक्रम बैठक के निमित्त नहीं कभी बिना काम के हाल चल ,सुख दुख पुछने के लिए ही सही,
कभी योजना करके भ्रमण घुमाण सहभोज यह सब शून्य हो गए, जिला ,विभाग प्रचारक स्तर के कार्यकर्ता 3/4 वर्ष जिला विभाग केंद्र में बिताकर चले जाते हैं खंड कार्यवाह,खंड संघ चालक, या उस जिला ,विभाग निवासी प्रान्त विभाग के कार्यकर्ता के घर नहीं पहुंच पाते…..
तो यह क्या है ?
प्रचारक का काम ही क्या….प्रवास,संपर्क और संवाद जो शरीरी संघ के भुजाएं हैं वही नहीं तो प्राण है भी तो विकलांग हैं…आप पूर्णकालिक या प्रचारक बने रहिए, सेवा के नाम पर बहुत बड़ी संख्या या कार्यालय के नाम बहु मंजिला भवन ,जिसमें अपना पन नहीं पहले भवन बने तो एक दरवाजा लेने के लिए 2800 रुपए 28 कार्यकर्ता से मांगते आज 28 लाख सिर्फ एक से लिया जा रहा है…..
मिलन मंडली
यह सिर्फ एक नाम नहीं अपितु कदम है ,पांव हैं जो या तो हैं ही नहीं या हैं तो हताहत हैं छाले है…. क्योंकि मिलन के नाम पर वैचारिकी नहीं राजनीतिक नारेबाजी हो गई है मंडल अध्यक्ष भाजपा या स्थानीय संसद विधायक मंत्री हों तो कुछ काम भी होगा, बरना काहे का मिलन काहे कि मंडली….
मुख्य मार्गो पर काम की चिंता ही नहीं बची,
शाखाओं का झूठा वृत्त, सहज ही स्वीकृत है….
सब कुछ देख सुन रहे हैं….और अपने आपको ही सुनकर बोल रहे हैं भारत माता की जय..
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भारत माता की जय ।।
