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लखनऊ खंडपीठ ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव को किया तलब

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों के लोकतांत्रिक ढांचे और ग्रामीण स्वशासन को लेकर एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। राज्य सरकार द्वारा निर्वाचित ग्राम प्रधानों के स्थान पर प्रशासकों (एडमिनिस्ट्रेटर्स) की नियुक्ति किए जाने के फैसले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने सरकार के 25 मई 2026 के इस आदेश को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से दो दिनों के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारियों को भी आवश्यक निर्देशों के साथ तलब किया है।
संविधान के 73वें संशोधन के उल्लंघन का आरोप
यह जनहित याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कुमार शर्मा द्वारा व्यक्तिगत रूप से (इन पर्सन) दायर की गई है। माननीय वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजन रॉय एवं न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष दलीलें पेश करते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि ग्राम प्रधानों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उनके स्थान पर सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति करना पूरी तरह से संविधान के 73वें संशोधन और स्थापित पंचायती राज व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। यह कदम ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वायत्तता को सीधे तौर पर आघात पहुंचाता है।”
अदालत ने उठाए गंभीर सवाल, आदेश को माना तर्कहीन
याचिकाकर्ता के तर्कों को सुनने के बाद माननीय खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया राज्य सरकार के इस शासनादेश पर गंभीर सवाल खड़े किए। न्यायालय ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार का यह आदेश तर्कसंगत आधार से रहित और स्थापित नियमों के अनुकूल प्रतीत नहीं होता। अदालत ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए महज दो दिन का समय दिया है।
ग्रामीण स्वशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों का सवाल
अदालत के बाहर पत्रकारों से बातचीत करते हुए एडवोकेट संजय कुमार शर्मा ने कहा कि यह कानूनी लड़ाई सिर्फ ग्राम प्रधानों के पद की नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की हजारों पंचायतों की संवैधानिक स्वायत्तता, लोकतांत्रिक मूल्यों और ग्रामीण स्वशासन की रक्षा से जुड़ा बेहद गंभीर मुद्दा है। उन्होंने न्यायालय से गुहार लगाई है कि इस असंवैधानिक आदेश को अविलंब निरस्त किया जाए और राज्य में तुरंत पारदर्शी तरीके से पंचायत चुनाव कराने के निर्देश जारी किए जाएं।
10 जुलाई को होगी अंतिम जिरह

हाईकोर्ट द्वारा समय सीमा तय किए जाने के बाद अब शासन स्तर पर हलचल तेज हो गई है। अपर मुख्य सचिव (पंचायती राज) को अदालत की आपत्तियों का विधिक और प्रशासनिक जवाब तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अब इस हाईप्रोफाइल मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई आगामी 10 जुलाई 2026 को जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की पीठ द्वारा की जाएगी, जिस पर पूरे प्रदेश के ग्रामीण जनप्रतिनिधियों की निगाहें टिकी हुई हैं।

विश्व वाणी समाचार सेवा

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