3️⃣1️⃣❗1️⃣0️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣6️⃣द्वापर युग का अंत और एक गूढ़ संकेत..!!
जब भगवान श्रीकृष्ण ने लीला समापन कर इस लोक से विदा ली, उसी क्षण धर्म के चरण डगमगाने लगे। धरती पर सत्य, करुणा और मर्यादा का प्रकाश मंद पड़ने लगा। यही वह क्षण था जब कलियुग का बीज अंकुरित हुआ।
कलि का प्रकट होना : कहते हैं कलि कोई साधारण काल नहीं बल्कि अधर्म का जीवंत स्वरूप है।
कृष्ण के प्रस्थान के बाद वह धरती पर विचरण करने लगा; जहाँ अहंकार, लोभ, मद, क्रोध और ईर्ष्या थीं, वहीं कलि को अपना घर दिखाई दिया।
राजा परीक्षित और कलि : एक दिन राजा परीक्षित ने देखा, एक व्यक्ति गाय (धर्म) और बैल (तप) को पीट रहा है।
राजा ने क्रोधित होकर उसे दंड देना चाहा।
वह व्यक्ति काँपते हुए बोला, “राजन! मैं कलि हूँ। मेरा समय अभी प्रारंभ हुआ है।”
राजा परीक्षित ने तुरंत उसे मारना चाहा, लेकिन कलि ने शरणागति माँगी।
कलि को मिला सीमित अधिकार : धर्मराज परीक्षित ने कहा, “मैं तुम्हें पूरे संसार में फैलने नहीं दूँगा। तुम केवल चार स्थानों में ही रह सकते हो”
मदिरापान
जुआ
व्यभिचार
असत्य से अर्जित धन
कलि ने सिर झुकाया और वहीं सीमित रह गया।
कलियुग का रहस्य और आशा :
कलियुग को अंधकार युग कहा गया,
पर शास्त्र कहते हैं, “जहाँ अन्य युगों में वर्षों की तपस्या चाहिए, वहीं कलियुग में केवल नाम-स्मरण से मुक्ति मिल जाती है।”
“हरि नाम ही कलियुग का आधार है।”
भक्ति सरल है, मार्ग सीधा है;
बस मन से पुकार होनी चाहिए।
कथा का सार :
कलियुग अधर्म का समय है, पर भक्ति का सर्वोत्तम युग भी।
यहाँ गिरावट तेज़ है, पर उद्धार भी उतना ही सरल।
नाम जपो, सत्य बोलो, करुणा रखो
यही कलियुग में धर्म है..!!
🙏🏻 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे 🙏🙏🏿जय श्री कृष्ण🙏🏾🙏🏼🙏🏽