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शरद पवार की पार्टी के भी दो टुकड़े कर दिए।

पासवान की पार्टी के भी दो टुकड़े कर दिए।

अकाली दल को तो गायब ही कर दिया।

उड़ीसा में BJD के साथ 20 साल तक सरकार बनाई, फिर मौका मिलते ही उसे भी लात मार दी।

मायावती की पार्टी का भी बखूबी इस्तेमाल किया और बसपा को लगभग खत्म सा ही कर दिया।

मुलायम समय रहते संभल गए, सो उनकी पार्टी टिकी रही है।

हरियाणा में तो इतने टुकड़े हुए है की लोग कंफ्यूज हो गए है।

आंध्र प्रदेश में भी भाई बहन में फूट डालकर दोनों को अलग कर दिया ताकि सत्ता प्राप्ति हो सके।

ऐसे तो अनगिनत उदाहरण है जहां भाजपा ने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया और इसी गद्दारी को चाणक्य नीति कहा और शाह को चाणक्य घोषित भी कर दिया।

आजादी की लड़ाई में जो लोग भारत के नहीं हुए थे वो आज तुम्हारे क्या होंगे ❓❓🤔🤔

गद्दार हर हाल में गद्दार रहेगा, मौका मिलते ही पीठ पे वार करेगा।

सुने हैं आजकल नीतीश बाबू और चंद्रबाबू कतार में है। देख लेना बहुत जल्द इनकी पार्टी को भी तोड़ा जाएगा। अंग्रेजो की नाजायज औलादों ने devide and rule policy का बखूबी इस्तेमाल किया है।
आगे आगे देखो किसकी बारी है ❓🤔

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सिर्फ चुनाव नहीं हारा था, अहंकार भी पराजित हुआ था!जुलाई 2022 में संसद के गलियारों में एक स्वर बार-बार सुनाई दे रहा था— “जवाब दो सोनिया गांधी…” “सुनो सोनिया गांधी…” “माफ़ी मांगो सोनिया गांधी…”अधीर रंजन चौधरी के एक बयान को लेकर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से तीखे अंदाज़ में सवाल किए। राजनीतिक बहस और आरोप-प्रत्यारोप लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन राजनीति में शब्दों और व्यवहार की मर्यादा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।कहा जाता है कि उस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को भीतर तक प्रभावित किया। इसके बाद अमेठी में राजनीतिक संघर्ष केवल चुनावी मुकाबला नहीं रहा, बल्कि प्रतिष्ठा और सम्मान का प्रश्न भी बन गया।2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अमेठी से अपने समर्पित कार्यकर्ता किशोरी लाल शर्मा को उम्मीदवार बनाया। चुनाव प्रचार की कमान प्रियंका गांधी ने संभाली और परिणाम सबके सामने था। स्मृति ईरानी को भारी अंतर से पराजय का सामना करना पड़ा।राजनीति के जानकार इस परिणाम को केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि सत्ता और पद के अहंकार पर जनता के निर्णय के रूप में भी देखते हैं।सत्ता स्थायी नहीं होती। पद, प्रतिष्ठा और अधिकार समय के साथ आते-जाते रहते हैं। जो स्थायी रहता है, वह है व्यक्ति का व्यवहार, उसकी विनम्रता और लोगों के प्रति उसका सम्मान।यही कारण है कि इतिहास बार-बार हमें सिखाता है—”ये सत्ता का दबदबा, ये हुकूमत, ये दौलत का नशा, किरायेदार हैं सब, घर बदलते रहते हैं।”पद का अहंकार कभी नहीं करना चाहिए। आज जो शिखर पर है, कल उसे भी जनता के बीच खड़ा होना पड़ सकता है। इसलिए शब्दों में संयम, व्यवहार में विनम्रता और विरोधियों के प्रति भी सम्मान बनाए रखना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।

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