अब हमारे देश में लड़कियों के चेहरे और जिस्म की नुमाइश नहीं होगी, बल्कि उनकी बुद्धि और वैज्ञानिक सोच का मुकाबला होगा।
अफ्रीका के एक छोटे से देश बुर्किना फासो ने हाल ही में एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी दुनिया की ब्यूटी इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया। वहां की सरकार ने मिस वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स जैसी सभी ‘ब्यूटी पेजेंट्स’ की फैक्ट्रियों पर ताला जड़ दिया और साफ कह दिया—
यानी अब वहां रैंप वॉक की जगह साइंस फेयर होंगे और ताज सुंदरता पर नहीं, इनोवेशन पर मिलेगा।
अब जरा इस तस्वीर को अपने देश के चश्मे से देखिए।
हमारे यहां आज भी हर गली-मोहल्ले में मिस फलाना और मिसेज ढिकाना बनने की होड़ मची है। करोड़ों का कॉस्मेटिक बाजार दिन-रात टीवी पर यही समझाता है कि अगर रंग साफ नहीं, तो करियर खतरे में है। जिस उम्र में बच्चियों के हाथ में कोडिंग की किताबें या साइंस प्रोजेक्ट होने चाहिए, उस उम्र में उन्हें समझाया जा रहा है कि जीरो फिगर और गोरापन ही असली मुकाम है।
सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय ने देश का नाम रोशन किया, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या 140 करोड़ के देश का भविष्य ग्लैमर और कॉस्मेटिक ब्रांड्स के मुनाफे से तय होगा?
इसरो की रॉकेट लॉन्चिंग में पसीना बहाने वाली महिला वैज्ञानिकों के नाम शायद 10% लोग भी नहीं जानते होंगे, लेकिन मिस इंडिया की पहली रनर-अप कौन थी, इस पर पूरा इंटरनेट रील्स बना रहा होता है।
बुर्किना फासो ने शायद यह समझ लिया कि जब तक दिमाग से ज्यादा चेहरे की कीमत रहेगी, तब तक देश सिर्फ बाजार बनेगा, महाशक्ति नहीं।
लोकतंत्र में किसी के शौक पर पाबंदी लगाना हल नहीं हो सकता, लेकिन प्राथमिकताएं तो बदली जा सकती हैं। जितना कवरेज, इनाम और शोहरत रैंप पर वॉक करने वालों को मिलती है, अगर उसका आधा भी साइंस ओलंपियाड जीतने वाली बेटियों को मिलने लगे—तो देश की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।
क्या भारत में भी ऐसे ब्यूटी शोज़ की जगह साइंस और इनोवेशन प्रतियोगिताओं को राष्ट्रीय मंच मिलना चाहिए, या ग्लैमर भी जरूरी है?