
संयुक्तता के आधार पर संतकबीरनगर में प्रजापति समाज तो गोरखपुर में निषाद समाज के एक्टीविटी के बाद अब आजमगढ़ में राजभर समाज का आगे आना यह प्रदर्शित करता है कि उत्तर प्रदेश में 17 अतिपिछड़ी जातियां अपने संवैधानिक हक अधिकार और सामाजिक न्याय के लिए एकजुट होकर लड़ना तो पहले से चाह रही थी लेकिन हमारे बीच के तथाकथित अगुआ अपने निजी स्वार्थ के लिए जातिगत गुटबाजी में उलझाते चले गए। जिसका नतीजा है कि आज गली गली में वंचित अतिपिछड़ो के राष्ट्रीय, प्रदेश और जिला अध्यक्ष घूमते मिलेंगे और सबके सब एक दुसरे की बुराई करते हुए अपने आप को बेहतर बताते हैं। इससे इन समाजो के लोग भी असमंजस में हैं कि वे जाए तो किधर और इस आपसी विघटन का नाजायज़ फायदा उठाते हुए बड़े राजनीतिक दल आसानी से यूज एंड थ्रो का खेल खेलते जा रहे हैं इस नाते शासन प्रशासन सरकार विपक्ष मिडिया और न्यायपालिका तक हमें गंभीरता से नहीं लेती, सबके फ्लाप होने का यही मुख्य कारण है। अतिपिछड़ा एकीकरण महाअभियान से लोगों में संयुक्त आंदोलन को लेकर एक उम्मीद जगी है इस नाते पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजेश तुरैहा, देवेन्द्र कश्यप, रोहतास प्रजापति, सुरेन्द्र प्रजापति और सुग्रीव पंडित आदि बड़े चेहरों के बीच समन्वय स्थापित होने की प्रबल संभावना दिख रही है जिससे सियासी तापमान अंदरखाने सातवें आसमान पर है।