सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से बर्खास्त करना हत्या के समान है
विशाल कश्यप/एजेंसी, नई दिल्ली। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी कर कहा कि सरकारी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त किया जाना मौत की सजा से कम नहीं है।
कोर्ट ने तमिलनाडु की पेरियार यूनिवर्सिटी के बर्खास्त डिप्टी रजिस्ट्रार आर. सरवनन को फिर से बहाल करने का निर्देश दिया, जिन्हें कथित तौर पर आय के ज्ञात स्रोतों से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में नौकरी से निकाल दिया गया था।
माननीय सुप्रीम कोर्ट जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश को खारिज करते हुए एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा।
बताया जाता है कि यूनिवर्सिटी द्वारा गठित एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट बिना किसी ठोस सबूत के तैयार की गई थी। केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर किसी को दोषी ठहरा देना न्याय का गला घोंटने के समान है खंडपीठ ने बिना किसी ठोस और न्यायसंगत कारण के एकल पीठ के फैसले में हस्तक्षेप किया था, जो गलत था।
माननीय सुप्रीम कोर्ट खंडपीठ ने कहा कि बर्खास्तगी की सजा मिलने पर सरकारी कर्मचारी को सेवा से जुड़े सभी लाभ गंवाने पड़ते हैं, जिससे वह पूरी तरह कंगाल हो जाता है। अगर नतीजे इतने गंभीर हैं, तो रिट कोर्ट को सिर्फ मूकदर्शक बनकर नहीं रहना चाहिए। ऐसे मामलों में, रिट कोर्ट को खुद लगाई गई पाबंदियों से बाहर निकलना चाहिए और सजा के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि एकल पीठ को इस मामले की सुनवाई करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि आरोपित के पास तमिलनाडु सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवा नियमों के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने का यह मतलब नहीं है कि रिट कोर्ट मूकदर्शक बनकर बैठ जाए। यदि किसी कर्मचारी पर अन्याय हुआ है और बिना किसी कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य के उसे नौकरी से निकाला गया है, तो हाईकोर्ट न्याय और निष्पक्षता के हित में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग कर सकता है।
कोर्ट ने पाया कि यूनिवर्सिटी ने बिना कोई कारण बताए और अटकलों पर आधारित रिपोर्ट को स्वीकार करके प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन किया है।
वही देश भर के लोगों का भी मानना है कि देश के ज्यादातर प्राइवेट सहायता प्राप्त संस्थानों में प्रबंध तंत्र मनमानी करते हैं। सरकारी कर्मचारियों को गुलाम से भी ज्यादा बढ़कर जिंदगी जीने को मजबूर करते हैं। प्राइवेट संस्थानों के प्रबंध तंत्र के द्वारा सरकारी पैसे को, संस्था को मिली सरकारी सहायता को व्यक्तिगत प्रयोग के लिए हजम करने करने के लिए सरकारी प्राइवेट कर्मचारियों पर सरपंच तंत्र द्वारा दबाव बनाया जाता हैं। प्राइवेट संस्थानों की प्रबंध कमेटी प्रबंधन तंत्र की मनसा के अनुरूप ऐसा कर्मचारियों के द्वारा न करने पर कोई ना कोई बहाना बलात्कार के केस एससी एसटी केस फर्जी बड़े के केस और न जाने कितने प्रकार के केस तैयार कर पहले कर्मचारियों को निलंबित और फिर बर्खास्त की कार्रवाई कर दी जाती है। क्योंकि प्रबंध तंत्र को पता होता है कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन सरकार देगी। प्राइवेट प्रबंध तंत्र प्रबंधन के पास से कुछ जाना नहीं होता बर्खास्त करने से सरकारी कर्मचारी प्राइवेट कर्मचारी पर दबाव बना रहेगा। इससे तो यही लगता है कि देश में प्राइवेट संस्थानों को सरकार से मान्यता नहीं मिलनी चाहिए और जिन्हें मिली हुई है उन देशभर के सभी प्राइवेट संस्थानों की भी तत्काल प्रभाव से सरकारी मान्यता रद्द कर देना चाहिए।