ज्ञान दो तरह का होता है। एक है संसार के बारे में ज्ञान। उसमें साइंस से लेकर साहित्य, शासन से लेकर प्रशासन, न्याय से लेकर संविधान और संसद, संसार की जितनी भी विधाएं होंगी ज्ञान प्राप्त करने की, वह सब अविद्या ज्ञान के अंतर्गत आती हैं। इनकी आवश्यकता को कम नहीं आंकना चाहिए।
संसार की सारी उपलब्धियां पद प्रतिष्ठा, धन सम्मान, सबकी प्राप्ति का माध्यम यह ज्ञान हैं। इस ज्ञान को प्रदान करने वाले को शिक्षक कहते हैं। शिक्षक ही आज का नहीं, सदैव का असली गुरु रहा है। उसी की मांग सबसे अधिक रही है।
परंतु शिक्षक तो अपने सभी विद्यार्थियों को एक जैसा ही ज्ञान देता है, फिर उनमें से कोई अधिक सफल हो जाता है, कोई कम सफल होता है। यहां रोल आता है शिष्य का। शिष्य के अंदर कितनी समझ है दुनिया दारी की, कितना चालाक है वह, कितना गुणा भाग, जोड़ घटाव कर लेता है वह परिस्थितियों को अपने अनुकूल करने हेतु, यह शिष्य की पैदायशी मेधा पर निर्भर करता है। माता पिता, संस्कार और परिस्थितियों का इसमें कितना योगदान होता है, यह कहना मेरे लिए बहुत कठिन है, क्योंकि एक ही माता पिता की संतानों की समान रूप से शिक्षा दीक्षा के उपरांत भी उनकी संतानों में एक कौवा की तरह चतुर चालाक निकल जाता है और दूसरा गाय के समान सीधा बना रहता है।
उन शिक्षकों को नमन और अभिनंदन जो हमको संसार में जीने की कला, और साध्य को प्राप्त करने का ज्ञान देते हैं।
इसके अतिरिक्त एक ज्ञान और होता है जिसे विद्या कहा जाता है। उसका ज्ञान देने वाले को गुरु कहते हैं। जो यह सिखाता है कि आत्मज्ञान क्या है और इसे किस तरह प्राप्त कर सकते हैं। इनकी डिमांड समाज में बहुत अधिक नहीं है। इस तरह गुरुओं में भी अनेक वैरायटी है। परंतु उनके पास जाने वाली अधिकतर शिष्य सांसारिक उपलब्धियों के हेतु ही जाते हैं। आत्मज्ञान के प्रति जिज्ञासुओं की संख्या बहुत कम होती है।
इसलिए गुरु पूर्णिमा की वह महिमा नहीं है जो शिक्षक दिवस की है।