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आजकल की कुछ पत्नियों के ड्रामे, मां-बाप डांटे तो बड़े हैं, और सास ससुर डांटे तो पीछे पड़े हैं। पिता के घर मेहमान आए तो भगवान है, और पति के घर मेहमान आए तो शैतान है। पिता डिमांड ना पूरी करे तो मजबूरी थी, पति ना पूरी कर पाए तो शादी क्या जरूरी थी। मायके की बातें किसी को नहीं बताती, और ससुराल की बातें किसी से नहीं छुपाती। भाई धमका दे तो लाड-प्यार है, और देवर-जेठ कुछ कह दे तो बेकार है।

🙏🌹 सुप्रभात 🌹🙏

सुरेन्द्र आर्य कश्यप
9278421710,8810203162

आजकल की कुछ पत्नियों के ड्रामे, मां-बाप डांटे तो बड़े हैं, और सास ससुर डांटे तो पीछे पड़े हैं। पिता के घर मेहमान आए तो भगवान है, और पति के घर मेहमान आए तो शैतान है। पिता डिमांड ना पूरी करे तो मजबूरी थी, पति ना पूरी कर पाए तो शादी क्या जरूरी थी। मायके की बातें किसी को नहीं बताती, और ससुराल की बातें किसी से नहीं छुपाती। भाई धमका दे तो लाड-प्यार है, और देवर-जेठ कुछ कह दे तो बेकार है।

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1970 के दशक में पश्चिम बंगाल की छात्र राजनीति में एक लड़की ने कदम रखा। चेहरा साधारण, मगर इरादे बेहद मजबूत। यह थीं ममता बनर्जी। 1975 में नेशनल लेवल के लीडर जय प्रकाश नारायण का विरोध करते हुए ममता ने जब उनकी कार की बोनट पर चढ़कर डांस किया तो वो राष्ट्रीय सुर्खियों में छा गईं। ये वही जेपी थे, जिनसे खुद इंदिरा गांधी भी बात करने में कई बार सोचती थीं। इसी दौर में वह कांग्रेस में शामिल हुईं। मगर, उनके राजनीतिक सफर में बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्होंने 10 बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले दिग्गज माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी को जादवपुर सीट से हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया। यहीं से ममता के बड़े राजनीतिक कदम की शुरुआत हो गई। इसके बाद से ममता ने फिर मुड़कर नहीं देखा। ये वही जादवपुर सीट है, जहां से मौजूदा टीएमसी की सयानी घोष भी सांसद हैं और तृणमूल की स्टार प्रचारक भी हैं, जो पश्चिम बंगाल चुनावों में ममता बनर्जी जैसी साड़ी और चप्पल पहनकर अपने बेबाक भाषणों से छाई हुई हैं।

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