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कृषि विभाग की संगोष्ठियों, मेलों और प्रशिक्षण से मिला मंच, ‘वेदांशी प्राकृतिक उत्पाद’ बना नई सोच की मिसाल

60-70 हजार प्रतिमाह मुनाफे से आत्मनिर्भर बन रहे रूपेंद्र धनकड़, किसानों को भी बना रहे उद्यमी

लोगों को खूब भा रहे कृषक उद्यमी के बनाए प्राकृतिक उत्पाद, योजनाओं से बन रहे स्वावलंबी

गन्ने बेल्ट में फूड प्रोसेसिंग कर जैविक उत्पाद किए लॉन्च, स्वाद के साथ सेहत भी पा रहे लोग

बागपत 28 अप्रैल 2026 – गन्ने का रस… कभी गर्मी में ठेले पर मिलने वाला एक साधारण पेय। लेकिन बागपत के ग्राम फैजपुर निनाना के युवा कृषक उद्यमी रूपेंद्र धनकड़ ने इसी गन्ने को नई पहचान दे दी। आज वही गन्ना, जो पहले केवल खेत से मंडी तक सीमित था, अब “ब्रांड” बन चुका है। और यह बदलाव केवल उत्पाद का नहीं, बल्कि सोच का है—“खेती अब सिर्फ खेती नहीं, बल्कि उद्यम बन सकती है।” सुबह का समय है। गांव की गलियों से होते हुए जब लोग रूपेंद्र के छोटे से यूनिट की ओर बढ़ते हैं, तो वहां गन्ने के रस की खुशबू और नए उत्पादों की तैयारी का उत्साह साफ दिखाई देता है। यही वह जगह है जहां एक किसान ने अपनी सोच को बदलकर अपनी किस्मत लिखी।

रूपेंद्र धनकड़ भी कभी सामान्य किसानों की तरह ही गन्ने की खेती करते थे। खेत में मेहनत, फसल तैयार, फिर मंडी में बिक्री—यही दिनचर्या थी। लेकिन आमदनी सीमित थी। वे बताते हैं, “गन्ना उगाते थे, बेचते थे… लेकिन मन में हमेशा लगता था कि कुछ नया करना चाहिए, कुछ ऐसा जो हमें अलग पहचान दे।” यही सोच उन्हें आगे ले गई।

बदलाव की शुरुआत तब हुई जब वे कृषि विभाग की संगोष्ठियों और किसान मेलों से जुड़े। इन कार्यक्रमों में उन्हें पहली बार यह समझ आया कि खेती को सिर्फ उत्पादन तक सीमित रखना नुकसान का सौदा है। असली लाभ तब है जब किसान अपने उत्पाद को वैल्यू एडिशन के जरिए बाजार में नई पहचान दे। कृषि विभाग के अधिकारियों और विशेषज्ञों ने उन्हें फूड प्रोसेसिंग, ब्रांडिंग और मार्केटिंग के बारे में जानकारी दी।

रूपेंद्र कहते हैं, “पहले लगता था कि ये सब बड़े लोग करते हैं, लेकिन विभाग ने समझाया कि छोटे किसान भी इसे कर सकते हैं।” यहीं से उनकी सोच बदली—और यही बदलाव उनकी सफलता की पहली सीढ़ी बना। उन्होंने गन्ने के रस से अलग-अलग उत्पाद बनाने का प्रयोग शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। कई बार उत्पाद सही नहीं बने, कई बार लोगों की प्रतिक्रिया उम्मीद के अनुसार नहीं मिली। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उन्होंने गुणवत्ता पर काम किया और नए प्रयोग किए।

कुछ ही समय में उन्होंने ‘वेदांशी प्राकृतिक उत्पाद’ के नाम से अपना ब्रांड शुरू किया। इस ब्रांड के तहत उन्होंने गन्ने के रस से कई अनोखे उत्पाद तैयार किए—केमिकल-फ्री आइसक्रीम और कुल्फी, 14 मसालों से बनी गन्ना-इमली चटनी, गन्ने के पेड़े, हर्बल चाय, गन्ने के रस की कोल्ड कॉफी और मटके की पारंपरिक विधि से बना सिरका। इन सभी उत्पादों की खास बात यह है कि ये पूरी तरह प्राकृतिक हैं और इनमें किसी भी प्रकार का रासायनिक पदार्थ नहीं मिलाया जाता। आज जब लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो रहे हैं, ऐसे में उनके उत्पादों को बाजार में तेजी से स्वीकार किया जा रहा है।

लोग जब उनके स्टॉल पर आते हैं, तो पहले उत्सुकता से देखते हैं, फिर स्वाद लेते हैं और फिर खरीदने के लिए आगे बढ़ते हैं। कई लोग तो यह जानने के लिए रुक जाते हैं कि ये उत्पाद बनते कैसे हैं। इस तरह रूपेंद्र का स्टॉल केवल बिक्री का माध्यम नहीं, बल्कि सीखने का केंद्र भी बन गया है। यहां कृषि विभाग और जिला प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। विभाग द्वारा आयोजित मेलों, प्रदर्शनियों और प्रशासनिक कार्यक्रमों में रूपेंद्र को स्टॉल उपलब्ध कराया गया। यही वह मंच था जहां उन्हें पहला बड़ा अवसर मिला। बिना बड़े निवेश के, उन्हें सीधे ग्राहकों से जुड़ने का मौका मिला। यही से शुरू हुआ—पहचान का सफर।

कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से प्राप्त प्रशिक्षण ने उनके काम को और मजबूती दी। वहां उन्होंने न केवल उत्पाद बनाने की तकनीक सीखी, बल्कि गुणवत्ता नियंत्रण, पैकेजिंग और बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन करना भी सीखा। कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन ने उनकी सोच को नया आयाम दिया। आज उनका उत्पाद केवल गांव तक सीमित नहीं है। मेरठ मंडल के कई जिलों में उनके उत्पाद पहुंच चुके हैं और लोगों द्वारा पसंद किए जा रहे हैं।

रूपेंद्र धनकड़ की सफलता का सबसे बड़ा पहलू यह है कि उन्होंने इसे केवल अपने तक सीमित नहीं रखा। आज वे अन्य किसानों को भी इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। कृषि विभाग की संगोष्ठियों में वे अपने अनुभव साझा करते हैं। किसान उनके पास आते हैं, उत्पाद चखते हैं और बनाने की विधि सीखते हैं। अब स्थिति यह है कि गांव के कई युवा और किसान भी फूड प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। एक व्यक्ति की पहल अब सामूहिक बदलाव का रूप ले रही है।

यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सामाजिक भी है। जहां पहले किसान केवल उत्पादन तक सीमित था, वहीं अब वह खुद को एक उद्यमी के रूप में देख रहा है। उसकी पहचान बदल रही है, उसका आत्मविश्वास बढ़ रहा है। सरकार की योजनाओं ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। कृषि विभाग की संगोष्ठियां, किसान मेले, प्रशिक्षण कार्यक्रम, फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने वाली योजनाएं—इन सभी ने मिलकर किसानों को नई दिशा दी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने आर्थिक सहारा दिया, वहीं प्रशिक्षण और मार्गदर्शन ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

जिला प्रशासन द्वारा भी ऐसे नवाचारों को लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है। अधिकारियों द्वारा किसानों को मंच प्रदान किया जा रहा है, उनकी सफलता को पहचान दी जा रही है और उन्हें अन्य किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनाया जा रहा है। यही कारण है कि बागपत अब केवल गन्ना उत्पादन के लिए ही नहीं, बल्कि नवाचार और प्राकृतिक उत्पादों के लिए भी पहचाना जाने लगा है। आज रूपेंद्र धनकड़ जब अपने काम को देखते हैं, तो उन्हें यह एहसास होता है कि यह केवल उनकी सफलता नहीं, बल्कि उस विश्वास की जीत है जो उन्होंने अपने सपनों पर किया। वे कहते हैं, “अगर सही जानकारी और सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो कोई भी किसान कुछ नया कर सकता है।”

उनकी यह कहानी उन हजारों किसानों के लिए प्रेरणा है जो अपनी खेती को नए तरीके से देखना चाहते हैं। यह कहानी बताती है कि छोटे गांव से भी बड़ी शुरुआत हो सकती है, और सीमित संसाधनों के बावजूद भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है। आज बागपत के खेतों में केवल गन्ना नहीं उग रहा—यहां नई सोच उग रही है, नए उत्पाद बन रहे हैं और नए उद्यमी तैयार हो रहे हैं। रूपेंद्र धनकड़ जैसे युवा यह साबित कर रहे हैं कि अगर सोच बदल जाए, तो किसान भी ब्रांड बना सकता है। और शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी ताकत है—यह केवल एक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि हजारों किसानों के लिए एक रास्ता है, एक प्रेरणा है और एक संदेश है कि “खेती में भी असीम संभावनाएं हैं, बस उन्हें पहचानने की जरूरत है।”

अगर रूपेंद्र धनकड़ की यात्रा को “पहले और अब” के रूप में देखा जाए, तो बदलाव स्पष्ट नजर आता है। पहले वे केवल कच्चा गन्ना बेचते थे, जिसमें लागत निकालने के बाद सीमित आमदनी बचती थी। बाजार मूल्य पर उनका नियंत्रण नहीं था और पूरी मेहनत के बावजूद मुनाफा सीमित रहता था। लेकिन आज वही गन्ना, जब प्रोसेस होकर विभिन्न उत्पादों के रूप में बाजार में जाता है, तो उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है।

इससे न केवल उनकी आय में वृद्धि हुई है, बल्कि आय का स्वरूप भी बदला है—अब यह एक बार मिलने वाली कमाई नहीं, बल्कि नियमित और विविध स्रोतों से आने वाली आय बन गई है। यही मॉडल अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। अब किसान समझ रहे हैं कि “कच्चा माल बेचने से ज्यादा लाभ, उसे उत्पाद में बदलकर बेचने में है।” इस तरह रूपेंद्र का मॉडल केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि “कम लागत में अधिक लाभ” का एक व्यवहारिक उदाहरण बन चुका है, जिसे गांव-गांव में अपनाया जा सकता है।

रूपेंद्र धनकड़ की इस पहल का सबसे बड़ा असर उनकी आय पर साफ दिखाई देता है। जहां पहले गन्ने की पारंपरिक खेती से सीमित कमाई होती थी और कई बार लागत निकालना भी चुनौती बन जाता था, वहीं अब फूड प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन के जरिए उनकी मासिक शुद्ध आय लगभग 60 से 70 हजार रुपये तक पहुंच गई है।

यह आय केवल एक फसल पर निर्भर नहीं है, बल्कि विभिन्न उत्पादों—जैसे आइसक्रीम, चटनी, पेड़े, हर्बल चाय और सिरका—की नियमित बिक्री से प्राप्त होती है। खास बात यह है कि अब उनकी आमदनी पूरे साल बनी रहती है, जिससे आर्थिक स्थिरता आई है। पहले जहां उन्हें बाजार के उतार-चढ़ाव का सीधा असर झेलना पड़ता था, वहीं अब अपने उत्पाद और ब्रांड के कारण वे बेहतर मूल्य प्राप्त कर रहे हैं। यह बदलाव न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहा है, बल्कि अन्य किसानों के लिए भी यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि योजनाओं से जुड़कर अगर खेती को उद्यम के रूप में अपनाया जाए, तो कम संसाधनों में भी अच्छी और स्थायी आय प्राप्त की जा सकती है।

सूचना विभाग, बागपत

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