
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्त्ता)
आज़ाद भारत के आर्थिक ताने-बाने की जब समीक्षा की जाती है, तो देश के आम नागरिक, किसान और जवान के जीवन तथा बड़े पूंजीपतियों के प्रति सरकारी व बैंकिंग व्यवस्था की नीति में एक गहरा विरोधाभास दिखाई देता है। वित्तीय अनुशासन और राजकोषीय घाटे का सारा गणित केवल देश की सीमाओं पर तैनात जवान और खेतों में पसीना बहाते किसान पर ही थोपा जाता है, जबकि बैंक और अदालतें देश के बड़े बकायेदारों के प्रति असाधारण दरियादिली दिखाते हैं।
देश की सुरक्षा में लगे युवाओं के लिए लागू की गई अग्निपथ योजना में 4 साल की अल्पकालिक सेवा और बिना आजीवन पेंशन की शर्त रखी गई। सरकार का तर्क था कि देश के कुल रक्षा बजट का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा केवल पेंशन और वेतन में चला जाता है, इसलिए इस बोझ को घटाकर सेना का आधुनिकीकरण करना आवश्यक है। राष्ट्रहित के नाम पर देश के युवाओं ने इस फैसले को स्वीकार किया, लेकिन जब इसी बचत की तुलना बैंकिंग व्यवस्था में हो रहे भारी-भरकम वित्तीय घाटे से की जाती है, तो व्यवस्था का असंतुलन साफ दिखने लगता है।
दूसरी तरफ देश का अन्नदाता है, जो पिछले 5 वर्षों में खेती के हर इनपुट पर 30 से 50 प्रतिशत की कमरतोड़ महंगाई झेल रहा है। ट्रैक्टरों की कीमतें 35 से 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जहाँ 45 एचपी का ट्रैक्टर पहले साढ़े छह लाख का था, वहीं अब साढ़े नौ लाख रुपये से अधिक का हो चुका है। रोटावेटर, कल्टीवेटर और हार्वेस्टर महंगे होने से जुताई और कटाई का किराया भी बढ़ गया है। डीएपी का कट्टा 1200 से बढ़कर 1350 रुपये और पोटाश 1000 से बढ़कर 1700 रुपये प्रति बैग तक पहुँच चुका है। कुल मिलाकर खेती की लागत में 40 प्रतिशत तक का इज़ाफ़ा हुआ है, जबकि महंगाई घटने के बाद किसान की वास्तविक आय में पिछले 5 वर्षों में केवल 1.5 से 3.5 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि हुई है। सरकार A2+FL लागत पर 50 प्रतिशत मुनाफ़ा जोड़कर गेहूं का 2585 रुपये और धान का 2441 रुपये प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य तय करने की बात करती है, लेकिन स्वामीनाथन आयोग के अनुसार व्यापक C2 लागत पर 50 प्रतिशत लाभ देने की मांग आज भी कागज़ों में दबी है। MSP की कानूनी गारंटी न होने और अनौपचारिक कर्ज के दबाव में एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार पिछले 5 वर्षों में 54,000 से अधिक किसानों व कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की है। यदि कोई छोटा किसान 50,000 रुपये का केसीसी लोन न चुका पाए, तो उसकी संपत्ति और ज़मीन की कुड़की के नोटिस जारी हो जाते हैं।
इसके ठीक विपरीत, कॉर्पोरेट जगत के लिए देश की कानूनी व बैंकिंग व्यवस्था एक अलग ही रूप दिखाती है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने ज़ी समूह के प्रमोटर सुभाष चंद्रा के 22,006 करोड़ रुपये के दावों का सेटलमेंट केवल 6.5 करोड़ रुपये में मंजूर किया, जो कि 99.97 प्रतिशत का कर्ज बट्टा यानी हेयरकट है। यह कोई इकलौता मामला नहीं है, पिछले 5 वर्षों में बैंकों द्वारा अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशंस के 49,000 करोड़ से अधिक के दावे पर 90 प्रतिशत से अधिक की कटौती की गई, डीएचएफएल के 87,082 करोड़ के बकाए को पीरामल समूह को लगभग 60 प्रतिशत नुकसान उठाकर बेचा गया, शिवा इंडस्ट्रीज के 4,863 करोड़ के दावे का 323 करोड़ में सेटलमेंट हुआ, भूषण पावर एंड स्टील के 47,158 करोड़ के दावे पर 59 प्रतिशत का बट्टा लगा और आलोक इंडस्ट्रीज के 29,523 करोड़ के कर्ज को 83 प्रतिशत हेयरकट के साथ निपटाया गया। बैंकिंग आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में बैंकों ने कॉर्पोरेट और उद्योगपतियों के लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के एनपीए को बट्टे खाते में डाला है।
जब बैंकों को इन बड़े पूंजीपतियों के डूबे हुए लोन के कारण हज़ारों करोड़ का घाटा होता है, तो बैंकों को दिवालिया होने से बचाने के लिए सरकार अपने वार्षिक बजट से बैंकों का पुनर्पूंजीकरण करती है, जो पैसा आम नागरिकों के टैक्स से आता है। इतना ही नहीं, बैंक अपने इस नुकसान की भरपाई करने के लिए आम जनता की एफडी और बचत खातों पर मिलने वाला ब्याज घटा देते हैं तथा होम लोन या वाहन लोन की दरें बढ़ा देते हैं।
यह पूरी तस्वीर यह उजागर करती है कि देश की नीतियां किस दिशा में झुक रही हैं। जब 11 करोड़ कृषि परिवारों के कल्याण के लिए पूरे देश का वार्षिक कृषि बजट लगभग 1.40 लाख करोड़ रुपये रखा जाता है और किसान को लागत के अनुसार मूल्य देने में राजकोषीय घाटे का हवाला दिया जाता है, तब कॉर्पोरेट घरानों के लाखों करोड़ रुपये बट्टे खाते में डालते वक्त यह राजकोषीय चिंताएँ गायब हो जाती हैं। जब तक देश का नीतिगत ढांचा जवान की सामाजिक सुरक्षा, किसान की फसल की लागत और देश के खजाने की सुरक्षा को पूंजीपतियों के व्यावसायिक घाटे से ऊपर नहीं रखेगा, तब तक लोकतंत्र और कल्याणकारी राज्य का दावा अधूरा ही रहेगा।
✍️मोहित चौहान (सामाजिक कार्यकर्त्ता)