क्या दलालों के भरोसे कश्यप समाज का भविष्य तय होगा ?
कश्यप समाज बार-बार एक ही सवाल पूछता है—
हमारी संख्या इतनी है, फिर भी हमारी राजनीतिक हिस्सेदारी इतनी कम क्यों है?
चुनाव आते ही समाज के बीच कुछ ऐसे चेहरे दलाल सक्रिय हो जाते हैं जो टिकट, उम्मीदवार और वोट के नाम पर सौदेबाजी की राजनीति करते हैं। सवाल यह है कि क्या समाज की राजनीतिक ताकत किसी व्यक्ति, गुट या कथित दलाल के हाथों गिरवी रखी जा सकती है?
दूसरा बड़ा सवाल समाज के मतदाता से है।
अगर हमारी वोट किसी दबंग या आर्थिक रूप से संपन्न प्रभावशाली समूह जाति के प्रभाव, निजी लेन-देन या स्थानीय दबाव में तय होगी, तो फिर हम अपनी राजनीतिक दिशा खुद कैसे तय करेंगे?
राजनीतिक हिस्सेदारी भीख में नहीं मिलती—उसे संगठित, जागरूक और विवेकपूर्ण मतदाता शक्ति से हासिल किया जाता है।
दशकों से आरक्षण, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन समाज को यह भी पूछना होगा—
कितने नेताओं ने इन मुद्दों को अपने राजनीतिक जीवन का वास्तविक एजेंडा बनाया?
विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा, जिला पंचायत इत्यादि चुनावो में कितनों ने चुनाव जीतने के बाद समाज के युवाओं, शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए ठोस काम किया? और कितनों ने केवल चुनाव के समय समाज की भावनाओं और आरक्षण के मुद्दे का इस्तेमाल किया?
अब समय है कि समाज नारे नहीं, हिसाब मांगे।
उम्मीदवार चाहे किसी भी पार्टी का हो, उससे पांच सवाल पूछे जाएँ—
- समाज के लिए आपका लिखित एजेंडा क्या है?
- शिक्षा और रोजगार के लिए आपकी ठोस योजना क्या है?
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए आपने क्या किया है?
- पिछले कार्यकाल में आपने समाज के लिए कौन-से काम कराए?
- चुनाव जीतने के बाद आपकी जवाबदेही समाज के प्रति कैसे तय होगी?
कश्यप समाज को किसी व्यक्ति की जेब, किसी जातीय दबंगई या किसी कथित दलाली के भरोसे अपना भविष्य तय नहीं करना चाहिए।
उम्मीदवार बिकाऊ नहीं—जवाबदेह होना चाहिए।
वोट बंटाऊ नहीं—निर्णायक होना चाहिए।
नेतृत्व दिखावटी नहीं—ईमानदार और परिणाम देने वाला होना चाहिए।
अब सवाल यह नहीं कि
“कश्यप समाज एकजुट क्यों नहीं होता?”
सवाल यह है—
**समाज को एकजुट होने से रोकता कौन है?
और समाज की राजनीतिक ताकत का लाभ आखिर किसे मिलता है?**
अब नारे नहीं—जवाब चाहिए।
अब वादे नहीं—हिसाब चाहिए।
अब दलाली नहीं—जवाबदेह नेतृत्व चाहिए।
कश्यप समाज का वोट किसी के चंगुल में नहीं,
कश्यप समाज के अपने विवेक और अपने भविष्य के लिए होना चाहिए। सही और ईमानदार व्यक्तित्व की छवि वाला कैंडिडेट ही हर कांस्टीट्यूएंसी पर उतारा जाए और दलाल वहां पर सक्रिय नहीं होना चाहिए।
✍️AKS