हम 5G और चमकते हुए हाइवे के दौर में जी रहे हैं, लेकिन अगर मैं कहूँ कि इसी देश में एक बस्ती ऐसी है जहाँ आज भी लोग पेट की आग बुझाने के लिए खेतों से चूहे पकड़कर भूनने को मजबूर हैं, तो शायद आप यकीन न करें। Viral
बिहार के ‘मुसहरी’ गाँव का बेहद कड़वा और खौफनाक सच है।
नेशनल हाईवे 80 से सिर्फ 300 मीटर और खड़िया पीपरा रेलवे स्टेशन से महज 200 मीटर दूर! 3 किमी के दायरे में तीन रेलवे स्टेशन हैं, लेकिन यह गाँव आज भी ‘विकास’ के नक्शे पर वजूद नहीं रखता।
कुछ दिन पहले जब मैं खेतों के कच्चे रास्तों, कीचड़ और भभकती बदबू के बीच से होकर इस गाँव में पहुँचा, तो हवा में कच्चे मांस के जलने की गंध तैर रही थी। पूछने पर जो पता चला, उसने अंदर तक झकझोर दिया—ये लोग खेतों से चूहे पकड़कर लाते हैं ताकि किसी तरह पेट भर सकें।
इंदिरा आवास’ के नाम पर कुछ लोगों को इतना कम पैसा थमा दिया गया कि वे दीवारों के ऊपर छत तक नहीं डाल सके।
50 घरों (लगभग 300 की आबादी) की इस बस्ती में एक भी शौचालय नहीं है। बीमारियां यहाँ की नियति बन चुकी हैं, और कोई स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं है।
स्कूल के नाम पर 5वीं तक का एक ढांचा है, लेकिन पूरे गाँव में कोई 6वीं पास शख्स मुझे नहीं मिला।
आस-पास के सभी गाँव बिजली से जगमगाते हैं, लेकिन यहाँ आज तक बिजली नहीं पहुँची। पूरे गाँव में सिर्फ एक शख्स ‘धारो’ के पास चाइनीज मोबाइल है। जब वह ऊँची आवाज़ में गाने बजाता है, तो पूरा गाँव उसे घेरकर सुनता है। और विडंबना देखिए, उस फोन को चार्ज करने के लिए भी धारो को दूसरे गाँव जाना पड़ता है।
इन लोगों ने अपनी इस बदनसीबी को ही अपना नसीब मान लिया है। टापू की तरह खेतों के बीच बसी इस आबादी का दर्द ऐसा है जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है।
कागजों पर और विज्ञापनों में विकास बहुत हो गया, लेकिन हाईवे से उतरकर 300 मीटर अंदर यह विकास आखिर कब पहुँचेगा?
आप इस जमीनी हकीकत पर क्या सोचते हैं? क्या इन लोगों तक कभी वह सम्मानजनक जीवन पहुँच पाएगा जिसके ये हकदार हैं?
इस ज़मीनी सच्चाई को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। शायद हमारी यह आवाज़ उन बहरे कानों तक पहुँच जाए, जिन्हें इस गाँव का दर्द दिखाई नहीं देता।
#GroundReport#RealityCheck#Musahari#Bihar#SocialAwareness#nonfollowers
See less
Viral
