जब पीड़ित परिवारों के पक्ष में सामाजिक कार्यकर्ता, जागरूक युवा या समाज के जिम्मेदार लोग आवाज उठाते हैं, तब कई बार अपराधियों तक कानून का शिकंजा पहुंचाने के बजाय आवाज उठाने वालों के शब्दों, उनके आक्रोश, उनकी भावनात्मक पीड़ा और भाषा की छोटी-छोटी त्रुटियों को मुद्दा बनाकर उन्हें ही घेरने का प्रयास किया जाता है। उनके खिलाफ जातिगत टिप्पणी, सामाजिक वैमनस्य या कानून तोड़ने जैसे आरोप लगाने की कोशिश की जाती है।


दु:खद स्थिति यह है कि गांवों, गली, मोहल्ले, और क्षेत्रों में जिन समूहों या जातियों का सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक वर्चस्व होता है, उनके प्रभावशाली लोग कई बार अपने अपराधियों को बचाने के लिए सामूहिक दबाव, साम-दाम-दंड-भेद, राजनीतिक पहुंच, सामाजिक नेटवर्क और कानूनी तकनीकों का इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। वहीं दूसरी ओर गरीब और पीड़ित परिवारों को डराने, तोड़ने, चुप कराने और न्याय की लड़ाई लड़ने वालों का मनोबल गिराने का प्रयास किया जाता है।
यह भी एक सच्चाई है कि पीड़ित पक्ष के समर्थन में खड़े लोगों को उकसाकर उनसे भावनात्मक या भाषाई गलती करवाने की कोशिश की जाती है, ताकि असली अपराध और अन्याय से ध्यान भटकाकर हटाकर संघर्ष करने वालों को ही कठघरे में खड़ा किया जा सके। आपका मनोबल तोड़ना भी एक संगठित साजिश है। आपको उकसाकर गलती करवाना भी एक रणनीति है।
इसलिए मैं सभी समाजों, वर्गों और समुदायों के उन युवाओं से अपील करता हूं जो न्याय, मानवता और सामाजिक सम्मान के न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं—
गाली का जवाब गाली से मत दीजिए। भावनात्मक प्रतिक्रिया को प्रमाण आधारित लड़ाई में बदलिए। शब्दों में संयम रखिए, तथ्यों को मजबूत रखिए और कानून की भाषा सीखिए।
जो लोग अभद्र टिप्पणियां, जातिगत गालियां, धमकियां या सामाजिक अपमान फैलाने का काम कर रहे हैं, उनके स्क्रीनशॉट, वीडियो, ऑडियो, पोस्ट, लिंक और सभी साक्ष्य सुरक्षित रखिए। बिरादरी के जिन युवाओं को अन्य समाज के लोग जाति सूचक गालियां दे रहे हैं समाज का नौजवान युवा उनके विरुद्ध कोई गालियों का प्रयोग ना करें केवल उनके स्क्रीनशॉट लेकर इकट्ठे कर लें। समाज के जिम्मेदार, शिक्षित और संभ्रांत लोगों की समितियां बनाकर इन सबका सामूहिक दस्तावेज तैयार कीजिए।
न्याय की यह लड़ाई किसी जाति या समुदाय के खिलाफ नहीं है। यह अपराध, अन्याय, शोषण, हिंसा और समाज को तोड़ने वाली सोच के खिलाफ लड़ाई है। इस लड़ाई को सड़क से सदन तक, प्रशासन से न्यायालय तक, राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों तक संवैधानिक पटल और कानूनी दायरे में मजबूती से रखी जाएगी।
याद रखिए:—
संयम कमजोरी नहीं होता।
तथ्य सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
संगठित जागरूक और कानूनी संघर्ष ही स्थायी न्याय का रास्ता बनाता है।
न्यायकीलड़ाई
सामाजिक_न्याय
संविधानकासम्मान
तथ्यऔरप्रमाण
मानवाधिकार
कानूनी_संघर्ष
अन्यायकेखिलाफ
संगठित_समाज
न्याय_मिलेगा
✍️AKS
