उन्होंने एक बड़ा बर्तन रखा। जब दोनों चाय आतीं, वे मुस्कुराते हुए उन्हें उसमें उँडेल देते और फिर सब मिलकर बाँटकर पी लेते। उनके लिए वह सिर्फ चाय नहीं थी — वह एकता का स्वाद था।
जब महात्मा गांधी उनसे मिलने आए और यह सुना, तो उन्होंने लौटकर कहा कि सुभाषचंद्र बोस का सबसे बड़ा योगदान एक ऐसी सेना खड़ी करना है, जिसमें हिंदू-मुसलमान का भेद मिट गया है।
बाद में मुकदमे से बरी होकर सहगल, ढिल्लन और शाहनवाज़ गांधी से मिले। गांधी ने हँसते हुए पूछा, “तुम तीनों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश कौन है?” ढिल्लन ने जवाब दिया, “अब यह भी आप ही तय कर दीजिए।” सब खिलखिला पड़े — जैसे जेल की दीवारें भी मुस्कुरा उठी हों।
नफ़रत के बहाने हर युग में मिल जाते हैं, मगर प्रेम के अवसर भी उतने ही होते हैं। सवाल सिर्फ इतना है — हम चाय को बाँटेंगे, या दिलों को मिलाएँगे?
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