जलभराव रोकने का एकमात्र तरीका, सिल्ट खरीदने की व्यवस्था-अनोखा जी
बारिश आते ही हर शहर और कस्बे का एक ही हाल हो जाता है। सड़कों पर पानी भर जाता है, दुकानों में पानी घुस जाता है, बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, और दफ्तर जाने वाले लोग घंटों जाम में फंस जाते हैं। लोग कहते हैं कि बारिश बहुत तेज थी, नाली छोटी है, शहर का विकास नहीं हुआ है, सरकार ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन सच यह है कि बारिश उतनी दोषी नहीं है जितना हम उसे मान लेते हैं। असली दोष उस गंदगी का है जो हमने अपनी नालियों में जमा कर रखी है। और उस गंदगी को निकालने की कोई नियमित व्यवस्था हमारे पास है ही नहीं।
मैं कई सालों से यह देख रहा हूं। नगर पालिका में सफाई कर्मचारी तो हैं, ट्रैक्टर ट्रॉली भी आती है, फॉगिंग मशीन भी चलती है, लेकिन नाली की नियमित सफाई कहीं नहीं होती। जब नाली पूरी तरह से चौक हो जाती है, पानी सड़क पर बहने लगता है, तब कहीं जाकर एक दो बार जेसीबी आती है, कीचड़ निकाला जाता है, फोटो खिंचती है, अखबार में खबर छपती है, और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। यह कोई समाधान नहीं है। यह तो बीमारी को दबाने का काम है।
नाली नाले चौक होने का मेन कारण है नाली नालों की नियमित सफाई का न होना। जब तक नाली रोज साफ नहीं होगी, जब तक उसमें जमी हुई सिल्ट को रोज बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक जलभराव होता रहेगा। हम बड़े बड़े नाले बना दें, चौड़ी सड़कें बना दें, पंपिंग स्टेशन लगा दें, लेकिन जब तक सिल्ट नहीं निकलेगी, पानी का रास्ता बंद रहेगा और पानी सड़क पर आएगा। यह प्रकृति का नियम है।
अब सवाल यह है कि यह सिल्ट आती कहां से है। लोग समझते हैं कि सिल्ट कूड़े से बनती है, पत्तों से बनती है, मिट्टी से बनती है। यह बात आधी सच है। असली सच्चाई यह है कि नाली नालों में जो सिल्ट होती है वह है घरों की फ्लैश का ओवर फ्लो। जिसे रोका नहीं जा सकता।
हमारे घरों में हर रोज शौचालय का फ्लश होता है, रसोई घर का पानी बहता है, नहाने धोने का पानी नाली में जाता है। उस पानी के साथ साबुन, तेल, मिट्टी, बाल, कागज के छोटे छोटे टुकड़े, सब कुछ बहकर नाली में पहुंचता है। नाली में पानी का बहाव धीमा होता है, इसलिए भारी कण नीचे बैठ जाते हैं। हल्के कण तैरते रहते हैं और आगे जाकर फंस जाते हैं। धीरे धीरे यही चीजें जमकर सिल्ट बन जाती हैं। यह सिल्ट न तो रुक सकती है और न ही इसे घरों में रोकने का कोई तरीका है। शहर में लाखों घर हैं, हर घर से रोज थोड़ा थोड़ा गंदा पानी निकलेगा और वह नाली में ही जाएगा।
इसलिए जो लोग कहते हैं कि लोग कूड़ा नाली में डालते हैं इसलिए नाली चौक होती है, वे आधी बात कह रहे हैं। कूड़ा डालना भी गलत है, उसे रोकना चाहिए, लेकिन असली समस्या वह सिल्ट है जो रोज बनती है, चाहे कोई कूड़ा डाले या न डाले। वही सिल्ट के रूप में जमता है जिसे बाहर निकलना जरूरी है क्योंकि ये जम कर नाली नलों को चौक कर देते हैं जिसे पानी नाली से निकलकर सड़क पर जलभराव के रूप में नजर आने लगता है।
एक बार सिल्ट जम जाए तो वह पत्थर की तरह सख्त हो जाती है। फिर पानी उस पर से बहता है, किनारे से रिसता है, और नाली का बहाव कम हो जाता है। बारिश में जब पानी का दबाव बढ़ता है तो नाली उस पानी को नहीं ले पाती और पानी बाहर निकलकर सड़क पर आ जाता है। यही जलभराव है। यही कारण है कि हल्की बारिश में भी शहर के निचले इलाकों में पानी भर जाता है। नाली भरी हुई है, पानी को जगह ही नहीं मिल रही।
अब इस समस्या का समाधान क्या है। मेरा मानना है कि जलभराव रोकने का एकमात्र तरीका ये है कि हम अस्थायी सफाई कर्मचारी को तो हटा दे और फिर उस धन का इस्तेमाल नाली, नाले आदि के कूड़े को खरीदने में करे।
यह सुनने में अजीब लग सकता है। लोग कहेंगे कि सफाई कर्मचारी हटाने से शहर और गंदा हो जाएगा। लेकिन जरा सोचिए। अभी जो व्यवस्था है उसमें अस्थायी सफाई कर्मचारी रखे जाते हैं, उन्हें महीने का वेतन दिया जाता है, लेकिन उनकी ड्यूटी तय नहीं है। कोई हाजिरी लगाकर घर चला जाता है, कोई सड़क पर झाड़ू लगाने के नाम पर समय काटता है, कोई ठेकेदार के आदमी हैं जो कागजों में काम दिखाते हैं। इस पूरे खर्च का नतीजा नालियों में नहीं दिखता। नालियां फिर भी भरी रहती हैं।
अगर यही पैसा हम सीधे काम पर लगाएं तो क्या होगा। अगर हम यह ऐलान कर दें कि नगर पालिका नाली की सिल्ट खरीदेगी, हर किलो सिल्ट के पैसे दिए जाएंगे, तो क्या होगा। बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो सड़कों से कूड़ा बीनने का काम करते हैं वो ही लोग नाली की सिल्ट को प्रतिदिन निकाल कर बेचने का काम कर देंगे।
यह व्यवस्था कई तरह से काम करेगी।
पहला, नाली रोज साफ होगी। जब सिल्ट का भाव होगा, जब उसे बेचकर पैसे मिलेंगे, तो कोई भी बेरोजगार आदमी सुबह उठकर नाली की सफाई करेगा। उसे किसी अधिकारी के आदेश का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। उसे अपने फायदे के लिए काम करना है। एक आदमी एक दिन में दस बारह नालियों की सिल्ट निकाल सकता है। अगर शहर में दो सौ ऐसे लोग लग जाएं तो पूरे शहर की नालियां हर हफ्ते साफ हो सकती हैं।
दूसरा, शहर में बेरोजगारी कम होगी। जो लोग आज सड़कों पर कूड़ा बीनते हैं, प्लास्टिक की बोतलें चुनते हैं, कबाड़ बेचते हैं, उन्हें एक नया और पक्का काम मिल जाएगा। सिल्ट निकालना मुश्किल काम नहीं है। एक फावड़ा, एक बाल्टी, एक ठेला चाहिए। नगर पालिका अगर उन्हें पंजीकृत कर ले, उन्हें पहचान पत्र दे दे, तो यह काम और व्यवस्थित हो जाएगा।
तीसरा, नगर पालिका का खर्च कम होगा और काम बढ़ेगा। आज अस्थायी कर्मचारियों पर जो पैसा खर्च होता है, उससे ज्यादा काम नहीं निकलता। वही पैसा अगर सिल्ट खरीदने में लगे तो हर रुपए का हिसाब होगा। जितनी सिल्ट आएगी, उतना पैसा जाएगा। कोई फर्जी हाजिरी नहीं, कोई फर्जी काम नहीं।
चौथा, पर्यावरण को फायदा होगा। आज जो सिल्ट नालियों से निकालकर सड़क किनारे डाल दी जाती है, वह फिर बारिश में नाली में चली जाती है। अगर हम उसे खरीदेंगे तो उसे एक जगह इकट्ठा करना पड़ेगा। उस सिल्ट का इस्तेमाल खाद बनाने में, जमीन भरने में, ईंट बनाने में किया जा सकता है। यह कचरा नहीं है, यह संसाधन है।
अब सवाल उठता है कि सिल्ट खरीदने की व्यवस्था कैसे चलेगी। इसके लिए एक सरल मॉडल बनाया जा सकता है। नगर पालिका शहर को वार्डों में बांट दे। हर वार्ड में एक सिल्ट संग्रह केंद्र बना दे। सुबह छह से दस बजे तक कोई भी आदमी अपनी ठेले पर सिल्ट लाकर वहां तौल सकता है। तौल के हिसाब से उसे उसी दिन या हफ्ते के अंत में पैसा दे दिया जाए। पैसा सीधे उसके बैंक खाते में जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
सिल्ट की कीमत बहुत ज्यादा नहीं रखनी है। मान लीजिए एक किलो सिल्ट का दाम दो रुपए रखा गया। एक आदमी अगर रोज सौ किलो सिल्ट लाता है तो उसे दो सौ रुपए रोज मिलेंगे। महीने के छह हजार रुपए। यह एक गरीब आदमी के लिए बहुत बड़ी रकम है। और नगर पालिका के लिए भी यह खर्चा बहुत बड़ा नहीं है। क्योंकि आज अस्थायी कर्मचारियों पर जो लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं, उससे यह काम आसानी से चल सकता है।
इसमें तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। हर संग्रह केंद्र पर एक मोबाइल ऐप या रजिस्टर हो जिसमें लिखा जाए कि किसने कितनी सिल्ट दी, किस वार्ड से दी। महीने के अंत में आंकड़े देखकर पता चल जाएगा कि शहर की किन नालियों से ज्यादा सिल्ट निकल रही है। उन नालियों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है। हो सकता है वहां घरों का कनेक्शन गलत हो, हो सकता है वहां नाली का ढाल ठीक न हो। डेटा से समस्या का पता चलेगा।
कई लोग कहेंगे कि सिल्ट खरीदने से लोग नाली में जानबूझकर मिट्टी डालेंगे ताकि ज्यादा सिल्ट बेच सकें। यह आशंका सही है, लेकिन इसका समाधान भी आसान है। सिल्ट की परिभाषा तय करनी होगी। नाली से निकली हुई गीली, सड़ी हुई सिल्ट ही खरीदी जाएगी। बाहर की सूखी मिट्टी नहीं खरीदी जाएगी। और अगर कोई ऐसा करता पाया गया तो उसका पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा। सख्ती और पारदर्शिता से यह धोखाधड़ी रोकी जा सकती है।
दूसरी आशंका यह है कि सफाई कर्मचारी हटाने से शहर में गंदगी फैलेगी। मेरा कहना है कि हम सफाई को खत्म नहीं कर रहे, हम सफाई के तरीके को बदल रहे हैं। अस्थायी कर्मचारी हटाने का मतलब यह नहीं कि कोई सफाई न करे। इसका मतलब है कि सफाई का काम ठेके पर देने की जगह सीधे जनता को देना। जो आदमी आज वेतन लेकर काम नहीं कर रहा, उसे हटाकर उसी पैसे से काम कराने वाले को पैसा दिया जाए। यह अन्याय नहीं है, यह सुधार है।
सच तो यह है कि सफाई का काम मशीन से नहीं, इंसान से ही होगा। नाली की सिल्ट निकालने के लिए न तो बड़ी मशीन काम करेगी और न ही जेसीबी। जेसीबी से नाली टूट जाती है, पाइप लाइन क्षतिग्रस्त हो जाती है। यह काम हाथ से, फावड़े से, बाल्टी से ही हो सकता है। और यह काम वही कर सकता है जिसे उसकी मेहनत का सीधा पैसा मिल रहा हो।
यदि हम इस सिल्ट को खरीदना शुरू कर दे तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो सड़कों से कूड़ा बीनने का काम करते हैं वो ही लोग नाली की सिल्ट को प्रतिदिन निकाल कर बेचने का काम कर देंगे। यह एक लाइन में पूरा प्लान है। इसमें न नया बजट चाहिए, न नई मशीन, न विदेशी तकनीक। सिर्फ एक छोटी सी सोच बदलनी है। सफाई को सेवा से बदलकर रोजगार बना देना है।
जिन शहरों में जलभराव सबसे ज्यादा होता है, वहां यही हाल है। नालियां सालों से साफ नहीं हुईं। नगर पालिका के पास कर्मचारी हैं, लेकिन काम नहीं है। ठेकेदार हैं, लेकिन जवाबदेही नहीं है। जनता है, लेकिन जागरूकता नहीं है। इस त्रिकोण को तोड़ने का एक ही उपाय है, काम को पैसों से जोड़ देना।
यह भी सच है कि एक दिन में सब कुछ नहीं बदलेगा। पहले हफ्ते में लोग शक करेंगे। दूसरे हफ्ते में कुछ लोग सिल्ट लाना शुरू करेंगे। तीसरे हफ्ते में जब उन्हें पैसा मिलेगा तो भीड़ बढ़ेगी। एक महीने में नालियां साफ दिखने लगेंगी। तीन महीने में जलभराव की शिकायतें आधी हो जाएंगी। छह महीने में लोग कहेंगे कि शहर में बारिश का पानी अब सड़क पर नहीं रुकता।
इसलिए मेरा सभी नगर पालिका अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों से निवेदन है कि इस प्रयोग को एक वार्ड में करके देखें। एक छोटे से क्षेत्र में सिल्ट खरीद केंद्र खोलें। दो महीने तक चलाएं। परिणाम खुद दिखेगा। उसके बाद पूरे शहर में लागू करना आसान होगा।
जलभराव कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह हमारी लापरवाही का नतीजा है। और लापरवाही को मेहनत और सही व्यवस्था से ठीक किया जा सकता है। सिल्ट खरीदने का विचार छोटा लग सकता है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा होगा। नाली साफ, सड़क साफ, शहर साफ, और गरीब के घर में रोज की रोटी का इंतजाम। इससे बेहतर योजना और क्या हो सकती है।