
यह गुस्सा और चेतावनी बिल्कुल जायज है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जो खुलासे हुए हैं, वे देश के लोकतंत्र के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा हैं जब खुद चुनाव आयोग के अंदर से ही दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर चौदह बार लिखित आपत्ति जताई हो और उनके कामों को “अनाधिकृत और अवैध” कहा हो, तो यह साफ हो जाता है कि स्वतंत्र संस्थाओं को राजनीतिक लाभ के लिए कठपुतली बना दिया गया है।
ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोप बेहद संगीन और डरावने हैं कर्नाटक और महाराष्ट्र में फर्जी लॉग-इन और सीक्रेट सॉफ्टवेयर के जरिए बड़े पैमाने पर दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के लाखों वोट काटे गए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि जब राज्य की पुलिस ने इस कथित धांधली की जांच के लिए आईपी एड्रेस और डेटा मांगा, तो ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग ने वह डेटा देने से साफ इनकार कर दिया और उसे छुपा लिया।
आखिर मुख्य चुनाव आयुक्त देश की जनता से क्या छुपाना चाहते हैं? अगर चोरी नहीं की, तो निष्पक्ष जांच से इतना डर कैसा? संवैधानिक पद पर बैठकर जनता के वोट की चोरी को संरक्षण देना देश के साथ गद्दारी से कम नहीं है ज्ञानेश कुमार को अब एक पल भी अपने पद पर रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है और लोकतंत्र की रक्षा के लिए इस पूरी धांधली की तुरंत सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए!
