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बागपत की डीएम के रूप में करीब 20 माह का कार्यकाल केवल योजनाओं और उपलब्धियों का नहीं, संवेदना, संवाद और नवाचार का भी रहा; एक युवा की नजर से उस अधिकारी की कहानी, जिसे लोगों ने पद से आगे बढ़कर अपनी डीएम माना

लेखक : अमन कुमार, उ0प्र0 राज्य युवा पुरस्कार विजेता सामाजिक कार्यकर्ता, जनपद बागपत

बागपत में आज एक जिलाधिकारी का तबादला हुआ है। सरकारी भाषा में यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है। आदेश आया, जिम्मेदारी बदली और अब कलेक्ट्रेट में एक नया नाम लिखा जाएगा। लेकिन समाज की अपनी भाषा होती है। उसमें हर बात सरकारी आदेश की तरह नहीं होती। कुछ खबरें लोगों के बीच जाकर अपना अर्थ बदल लेती हैं। डीएम अस्मिता लाल के तबादले की खबर भी ऐसी ही है। कागज पर यह एक स्थानांतरण है, लेकिन बागपत के बहुत से लोगों के लिए यह एक परिचित चेहरे की विदाई है।

मैंने बागपत में एक युवा के रूप में प्रशासन और समाज के बीच की दूरी को करीब से देखा है। हमारे जैसे जिले में कलेक्ट्रेट केवल एक सरकारी भवन नहीं है। वहां किसान अपनी जमीन की चिंता लेकर आता है, ग्रामीण अपने गांव की समस्या लेकर आता है, महिला सुरक्षा और सम्मान की उम्मीद लेकर आती है, युवा रोजगार और अवसर की तलाश में पहुंचता है, छात्र अपनी बात रखने आता है और फरियादी यह भरोसा लेकर आता है कि शायद उसकी बात कहीं सुनी जाएगी। इसलिए जिलाधिकारी का चेहरा केवल एक अधिकारी का चेहरा नहीं होता। वह आम आदमी के लिए पूरे प्रशासन का चेहरा बन जाता है।

डीएम अस्मिता लाल के कार्यकाल में इस चेहरे की एक अलग तस्वीर दिखाई दी। कभी वह किसान के पास बैठी दिखीं, कभी बच्चों के बीच, कभी अस्पताल में नवजात के पास, कभी महिलाओं के बीच और कभी किसी बेजुबान के सामने अपनी कुर्सी छोड़ते हुए। यही तस्वीरें आज उनके तबादले की खबर को सामान्य प्रशासनिक खबर से अलग बनाती हैं। कुछ अधिकारी अपने पीछे सड़कें, भवन और फाइलों में दर्ज योजनाएं छोड़ जाते हैं। कुछ अधिकारी आंकड़ों के साथ याद किए जाते हैं। लेकिन कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं जिनके जाने के बाद लोग सबसे पहले यह नहीं कहते कि कितने आदेश हुए, बल्कि कहते हैं—याद है, उस दिन डीएम खुद वहां बैठी थीं… डीएम अस्मिता लाल के कार्यकाल की कहानी शायद इसी एक वाक्य में सबसे अच्छी तरह समझी जा सकती है।

हमारे गांवों में किसान के लिए खतौनी सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं होती। खेत की जमीन, परिवार की हिस्सेदारी और आने वाली पीढ़ी की सुरक्षा कई बार उसी कागज से जुड़ी होती है। इसलिए तहसील की खिड़की पर खड़ा किसान किसी साधारण कागज का इंतजार नहीं कर रहा होता, वह अपने अधिकार की पुष्टि का इंतजार कर रहा होता है। जब डीएम अस्मिता लाल तहसील दिवस के बाद खुद खतौनी की खिड़की पर पहुंचीं और किसानों को खतौनी देने की प्रक्रिया को समझा, तो वह तस्वीर इसलिए याद रह गई क्योंकि उसमें एक बड़ा संदेश छिपा था—जिस खिड़की पर आम आदमी खड़ा है, वहां अधिकारी भी पहुंच सकता है।

शासन और जनता के बीच की दूरी हमेशा किसी बड़े सुधार से कम नहीं होती। कभी-कभी वह सिर्फ कुछ कदम चलकर भी कम हो जाती है। शायद यही कारण है कि उनके कार्यकाल की कई तस्वीरों में मुझे सबसे ज्यादा महत्व इसी बात का दिखाई देता है—उन्होंने कई बार लोगों को अपने पास बुलाने के बजाय खुद लोगों तक पहुंचने की कोशिश की।

कलेक्ट्रेट में आने वाला व्यक्ति आमतौर पर अपनी समस्या लेकर आता है। वह परेशान होता है, कभी उम्मीद में होता है, कभी निराश होकर लौटता है। ऐसे में फरियादी को आम का पौधा देने की पहल केवल पर्यावरण अभियान नहीं लगती। इसमें एक मानवीय स्पर्श भी है। सोचिए, कोई व्यक्ति अपनी समस्या लेकर कलेक्ट्रेट आया। उसकी समस्या का समाधान हुआ या प्रक्रिया आगे बढ़ी। जाते समय उसके हाथ में एक पौधा भी है। वह पौधा उसके घर पहुंचेगा, आंगन या खेत में लगेगा और वर्षों बाद बड़ा होगा। तब शायद उसे याद आए कि यह पौधा उसे कलेक्ट्रेट से मिला था। प्रशासनिक काम की यही खूबसूरती है—कभी-कभी सबसे छोटी पहल सबसे लंबी स्मृति बन जाती है।

बागपत में नव देवियों की शक्ति, बेटी का नाम-घर की शान, मेरी बेटी मेरी कुलदीपक और कन्या जन्मोत्सव जैसी पहलों ने बेटियों को लेकर संवाद को एक नया रूप दिया। अस्पताल में जन्मी बच्ची को जन्म प्रमाणपत्र, बेबी किट, पौधा और योजनाओं से जोड़ने की कोशिश ने बेटी के जन्म को सरकारी प्रक्रिया से निकालकर सामाजिक उत्सव का रूप देने की कोशिश की। मेरे लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गांव में बेटी के जन्म की खबर आज भी हर घर में एक जैसी खुशी नहीं लाती। कई परिवारों में आज भी बेटे और बेटी के बीच उम्मीदों का फर्क दिखाई देता है। ऐसे में जब प्रशासन खुद अस्पताल पहुंचकर कहता है कि बेटी का जन्म भी उत्सव है, तो वह केवल एक परिवार से बात नहीं करता। वह पूरे समाज से बात करता है।

नव देवियों की शक्ति में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता को जोड़ने की कोशिश भी इसी व्यापक सोच का हिस्सा रही। किशोरियों के लिए किशोरी का पिटारा, महिलाओं के हुनर को रोजगार से जोड़ने के प्रयास और खाप पंचायतों तक संवाद ले जाने की कोशिशें बताती हैं कि महिला सशक्तीकरण को केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, निरंतर सामाजिक परिवर्तन के रूप में देखने का प्रयास किया गया। महिला सुरक्षा पर हम वर्षों से बात करते आए हैं। कानून हैं, हेल्पलाइन हैं, अभियान हैं। लेकिन किसी महिला के लिए सुरक्षा का अर्थ तब बदलता है जब उसे अपने हाथ में कोई ऐसा साधन मिलता है जिसका इस्तेमाल वह आपात स्थिति में कर सके। बागपत में की-चेन अलार्म की पहल इसी सोच का उदाहरण थी। छोटा उपकरण था, लेकिन विचार बड़ा था—सुरक्षा को महिला की रोजमर्रा की जिंदगी के करीब लाना।

किसी नीति की सफलता का एक पैमाना यह भी है कि वह कितनी आसानी से आम आदमी की जिंदगी में उतर सकती है। इस पहल ने कम से कम इतना जरूर किया कि महिला सुरक्षा की चर्चा को एक व्यावहारिक, दिखाई देने वाले उपकरण से जोड़ा। और जब यह स्थानीय पहल राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंची तो उसके साथ बागपत का नाम भी पहुंचा। बच्चों के लिए स्कूल सिर्फ पढ़ने की जगह नहीं, सुरक्षित बचपन की जगह भी हो। बच्चों को देखकर हम अक्सर पूछते हैं—स्कूल जा रहा है या नहीं? लेकिन उससे पहले यह सवाल होना चाहिए—स्कूल में सुरक्षित है या नहीं? जानो, खेलो और जीतो जैसे सांप-सीढ़ी आधारित खेल के जरिए बच्चों को अच्छे-बुरे स्पर्श, व्यक्तिगत सुरक्षा और अपने अधिकारों के बारे में समझाने का प्रयास इसी सोच को सामने लाता है। बच्चे को वह बात खेल में समझ आ सकती है, जो शायद किसी लंबे भाषण में नहीं समझ आए। आवासीय विद्यालयों में एंटी-सुसाइड फैन डाउन रॉड लगाने की पहल भी इसी दिशा का हिस्सा थी। यह कोई ऐसी चीज नहीं थी जिसकी चर्चा बच्चे घर जाकर करें। लेकिन शायद यही इसकी अहमियत थी—बच्चे की सुरक्षा के लिए ऐसी चीजें पहले से कर देना, जिनकी जरूरत पड़ने की नौबत ही न आए।

साँस पहल के जरिए नवजातों की शुरुआती देखभाल और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रशिक्षण पर जोर भी इसी सोच को आगे बढ़ाता है। जन्म से लेकर स्कूल तक, बच्चे प्रशासन की प्राथमिकता में दिखाई दिए। कभी-कभी किसी अधिकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि एक तस्वीर होती है अगस्त में जब कठिन परिस्थितियों में मिली दो नवजात बच्चियां अस्पताल पहुंचीं और डीएम अस्मिता लाल ने वहां जाकर उनका हाल जाना, तो उनकी गोद में बच्चियों की तस्वीर सामने आई। मैंने उस तस्वीर को किसी सरकारी उपलब्धि की तरह नहीं देखा। वह उससे कहीं ज्यादा मानवीय थी। दो बच्चियां थीं, जो दुनिया में आईं तो शायद उनके आसपास कोई अपना नहीं था। उस समय जिलाधिकारी का उनके पास होना इस बात का प्रतीक बन गया कि समाज उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगा। प्रशासनिक व्यवस्था का यही मानवीय चेहरा लोगों के भीतर भरोसा पैदा करता है।

बागपत ने कचरे में भी संभावना देखनी शुरू की। पुरा महादेव का जीरो-वेस्ट मेला, भक्ति भी, प्रकृति भी, गांवों में बर्तन बैंक, फूलों से खाद, दूध को पशुओं तक पहुंचाने की व्यवस्था, पुराने कपड़ों से नन्ही कली जैसी गुड़िया और अनुपयोगी सामग्री को उपयोगी बनाने के प्रयोग—ये सभी अलग-अलग पहलें थीं, लेकिन इनके पीछे एक विचार दिखाई देता है। कचरे को केवल फेंकने की चीज न मानकर उसे संसाधन की तरह देखना। बड़े धार्मिक आयोजनों में पर्यावरण का सवाल आसान नहीं होता। आस्था बड़ी होती है, भीड़ बड़ी होती है और कचरा भी बहुत होता है। ऐसे में जीरो-वेस्ट की कोशिश यह बताती है कि परंपरा और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बर्तन बैंक की पहल भी इसी वजह से महत्वपूर्ण है। प्लास्टिक छोड़ने की अपील के साथ उसका विकल्प देना ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है।

और फिर मटरूआया, जिसने डीएम की कुर्सी को भी कहानी बना दिया। डीएम अस्मिता लाल के कार्यकाल की कहानी में मटरूशायद सबसे अनपेक्षित पात्र है। किसान दिवस की बैठक चल रही थी। लंगूर आया और डीएम की कुर्सी पर बैठ गया। बैठक रुकी। अधिकारी सामने थीं। और उन्होंने अपनी कुर्सी छोड़ दी। बस इतना ही हुआ था। लेकिन सोशल मीडिया ने इस छोटे से दृश्य को कहानी बना दिया। क्यों? क्योंकि व्यवहार को किसी प्रेस नोट की जरूरत नहीं होती। किसी बेजुबान के सामने भी सहज रहना, उसे केवल परेशानी मानकर हटाने की कोशिश न करना—यह एक छोटी घटना थी, लेकिन लोगों को छू गई। इसके बाद बर्ड हाउस, पक्षियों के लिए दाना-पानी और स्ट्रीट डॉग्स के लिए शेल्टर जैसी पहलें भी सामने आईं। आज डीएम अस्मिता लाल के जाने पर मजाक और भावुकता के बीच लोग यह भी कह रहे हैं कि मटरूकी डीएम चली गईं। किसी अधिकारी के लिए इससे ज्यादा अनोखी विदाई शायद क्या होगी?

बागपत की पहचान में कुछ नए शब्द जुड़ गए। संविधान पार्क, इंटरएक्शन आर्ट, नागरिक कर्तव्यों से जुड़े सार्वजनिक संदेश, जीरो-वेस्ट मॉडल, महिला सुरक्षा अलार्म, बच्चों की सुरक्षा का खेल, किसान समाधान, रोजगार मेले और स्थानीय उत्पादों को पहचान देने के प्रयास—इन सबने बागपत की पहचान में कुछ नए शब्द जोड़े। बागपत की पहचान पहले से ही समृद्ध है। सिनौली का इतिहास है, पुरा महादेव की आस्था है, किसान की मेहनत है। लेकिन किसी जिले की पहचान केवल उसके अतीत से नहीं बनती। उसका वर्तमान भी उसकी पहचान बनाता है। डीएम अस्मिता लाल के कार्यकाल में कई बार बागपत की खबर इसलिए बाहर गई क्योंकि यहां कुछ नया किया गया। और जब किसी जिले का नाम उसकी समस्या के कारण नहीं, उसके समाधान के कारण राष्ट्रीय समाचारों में आए, तो उसका असर पूरे जिले के आत्मविश्वास पर पड़ता है।

सबसे बड़ी बात—लोगों ने उन्हें याद किया। तबादले की खबर आने के बाद जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है, वह यही है कि लोगों ने अपने-अपने अनुभवों से उन्हें याद किया। छात्रों ने शिक्षा से जुड़े कार्यक्रम याद किए। ग्रामीणों ने गांवों तक पहुंची पहलें। महिलाओं ने सुरक्षा और बेटियों से जुड़े प्रयास। युवाओं ने संवाद और अवसर। किसानों ने राजस्व समाधान और खतौनी की तस्वीर। खिलाड़ियों ने खेल गतिविधियां। अधिवक्ताओं और व्यापारियों ने प्रशासन से संवाद। अधिकारी और कर्मचारी अपने साथ काम करने के अनुभवों को याद कर रहे हैं। हर किसी के पास पूरी कहानी नहीं है। हर किसी के पास एक छोटी-सी कहानी है। और शायद किसी अधिकारी की सबसे बड़ी जनस्वीकृति यही होती है कि हजारों लोगों के पास उसकी अपनी-अपनी छोटी कहानी हो।

मैं डीएम अस्मिता लाल के कार्यकाल को याद करते हुए किसी एक योजना को उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं कह सकता। मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी सीख यह है कि नेतृत्व केवल पद से नहीं आता। नेतृत्व तब दिखाई देता है जब अधिकारी समस्या को फाइल से बाहर निकलकर देखता है। जब किसान की परेशानी कागज पर लिखे आवेदन से आगे जाकर उसकी आंखों में दिखाई देती है। जब बेटी का जन्म एक आंकड़ा नहीं, उत्सव बनता है। जब बच्चे की सुरक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी नहीं, उसके पूरे बचपन से जुड़ती है। जब महिला सुरक्षा पर भाषण के साथ कोई छोटा उपकरण भी दिया जाता है। जब पर्यावरण केवल पौधारोपण दिवस नहीं, धार्मिक मेले की व्यवस्था में भी दिखाई देता है। और जब बेजुबान भी प्रशासन की संवेदना से बाहर नहीं रहता।
यही वजह है कि डीएम अस्मिता लाल की विदाई मुझे सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं लगती। यह उस दौर की विदाई है जिसमें बागपत ने प्रशासन का एक मानवीय चेहरा देखा। अब नई जिलाधिकारी आएंगे। नई प्राथमिकताएं होंगी। नई योजनाएं होंगी। प्रशासन आगे बढ़ेगा। यही व्यवस्था का स्वाभाविक नियम है। लेकिन कुछ चीजें आदेश से नहीं बदलतीं।

किसान को खतौनी वाली तस्वीर याद रहेगी। किसी परिवार को बेटी के जन्म का दिन याद रहेगा। किसी महिला को हाथ में मिला सुरक्षा अलार्म याद रहेगा। किसी बच्चे को खेल के जरिए सीखी अपनी सुरक्षा याद रहेगी। किसी सफाईकर्मी को मिला सम्मान याद रहेगा। किसी युवा को मिला अवसर याद रहेगा। किसी पर्यावरण प्रेमी को जीरो-वेस्ट पुरा महादेव याद रहेगा। और बागपत को शायद वह मटरूभी याद रहेगा जिसने डीएम की कुर्सी पर बैठकर पूरे देश को एक छोटी-सी तस्वीर दे दी थी। यही तस्वीरें किसी कार्यकाल की असली कहानी बनती हैं।

मैं डीएम अस्मिता मैम को एक युवा की नजर से देखता हूं तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मुझे किसी एक पुरस्कार, किसी एक योजना या किसी एक राष्ट्रीय खबर में नहीं दिखती। वह मुझे उस दूरी में कमी के रूप में दिखाई देती है जो आम आदमी और प्रशासन के बीच अक्सर बनी रहती है। उन्होंने हर समस्या हल कर दी हो, ऐसा कहना सही नहीं होगा। कोई भी अधिकारी किसी जिले की सारी समस्याएं समाप्त नहीं कर सकता। लेकिन उन्होंने कई बार यह दिखाया कि समस्या के सामने संवेदनशील होकर खड़ा होना भी समाधान की शुरुआत है।

और शायद यही कारण है कि बागपत में आज लोग उनके तबादले की खबर को पढ़कर केवल अगला नाम नहीं देख रहे। वे पीछे मुड़कर देख रहे हैं। अपने अनुभवों को। उन तस्वीरों को। उन छोटी-छोटी मुलाकातों को। और उस दौर को, जब कलेक्ट्रेट की एक अधिकारी कई लोगों के लिए अपनी डीएम बन गई थीं।

डीएम अस्मिता लाल बागपत से जा रही हैं। जिम्मेदारी बदल रही है। पद बदल रहा है। लेकिन उनके कार्यकाल में बनीं ये यादें यहीं रहेंगी। क्योंकि सरकारी कुर्सियां बदलती रहती हैं। लोगों के दिलों में बनी जगह नहीं। और शायद बागपत की ओर से उनकी सबसे सच्ची विदाई यही है— मैम, आपकी कुर्सी अब कोई और संभालेगा, लेकिन बागपत की यादों में आपकी जगह आपकी ही रहेगी। एक युवा के रूप में बस आपसे प्राप्त विश्वास और सम्मान की गरिमा को बनाए रखते हुए मैं और मेरे युवा साथी जनपद के विकास में निरंतर भागीदारी करते हुए आपके इस विरासत को खूब आगे बढ़ाएंगे।

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