दोस्तो नमस्कार,
दोस्तो हमारा जलवंशी समाज पिछड़ा क्यों है,गरीब क्यों है,बड़े बड़े पदों पर क्यों नहीं है,राजनीति में हिस्सेदारी क्यों नहीं है?????
आइये एक वास्तविक कहानी आपके बीच रख रहा हूँ जिससे स्पष्ट हो जाएगा कि हमारा विकास क्यों नहीं हो रहा है???
दोस्तो सन् 2022 की बात है एक कश्यप भाई के दो बच्चे एक स्कूल में पढ़ते थे। उन दोनो बच्चों की फीस करीब पांच महीने से ड्यू चल रही थी।
प्रिंसिपल साहब ने उन्हें फोन कर बोला कि भाई साहब आपके बच्चों की फीस कई महीनों से बकाया है। जमा करा दो तो स्टाफ की सैलरी जाने में कुछ मदद मिल जाएगी।
चूंकि स्कूल प्राइवेट है इसलिए टीचर की सैलरी हेतु केंद्र या राज्य सरकार पैसा नहीं देती है और ना ही स्कूल के चेयरमैन सर अपने जेब से देते हैं।
उन कश्यप भाई साहब जी का जवाब आया कि मास्साब इस महीने मेरा हाथ थोड़ा टाइट है। इस महीने काफी खर्चे रहे हैं, एक देवी मैया का झंडा चढ़ाया था उसमें बजट से ज्यादा खर्चा हो गया है।
प्रिंसिपल साहब ने धीरे से मुस्कुराये और पूछा….😊🤔
भाई साहब देवी मैया के झंडा में कितना खर्चा हो गया है???
जवाब आया……
करीब पचास हजार रूपए खर्च हो गये हैं मास्साब।
प्रिंसिपल साहब ने कहा….
अच्छा,,,,,,🧐🧐
देवी का झंडा चढ़ाने के लिए आपके पास पचास हजार रूपए मैनेज हो जाते हैं पर बच्चों की फीस देने के लिए मैनेज नहीं होते हैं।
😊😀😰
दोस्तो,
इतना सुनते ही वो कश्यप भाई साहब जी एक दम नाराज हो गए और बोले कि अब हम आपके स्कूल में अपने बच्चे नहीं पढ़ाएंगें। और उसी दिन वो विद्यालय में गए, बकाया की फीस जमा की और टीसी लेकर अपने बच्चे बीच सत्र में ही विद्यालय से निकाल ले गए।
दोस्तो,धर्म का चश्मा इतना प्रभावशाली है कि इसके आगे बच्चों की पढ़ाई, रिश्ते, बिरादरी सब छोटी पड़ जाती है।
और इसीलिए धर्म को आँखें बंद कर मानने वाले लोग पिछड़े हैं जिन्हें पिछड़ा वर्ग कहते हैं।
दोस्तो धर्म तो मैं भी मानता हूँ और कट्टर हिंदू हूँ। सुबह शाम भोलेनाथ की अगरबत्ती और दीपक जलाकर पूजा भी करता हूँ पर इन कश्यप भाई साहब की तरह पाखण्ड नहीं करता हूँ। और ना ही उन कश्यप जी की तरह बच्चों की फीस जमा करने के बजाय धर्म में खर्च करता हूँ।
धर्म में मैं भी पैसे खर्च करता हूँ पर पहले अपना घर देखता हूँ, उसके बाद यदि जेब में गुंजाइश होती है तो धर्म के नाम पर मानव सेवा में करता हूँ। मंदिर में दान भी देता हूँ पर पहले घर के खर्चे और बच्चों की पढ़ाई देखता हूँ।
मुझे पता है अच्छे कर्म करेंगे तो अच्छा फल मिलेगा, झंडा चढ़ाने से ना नौकरी मिलती है, ना पैसा मिलता है और ना ही कोई बीमारी ठीक होती है और ना ही बच्चे पैदा होते हैं।
अच्छी पढ़ाई करेंगे तो अच्छी नौकरी मिल जाएगी और फिर पैसा स्वत: ही आएगा, बीमारी का इलाज वैद्य या डॉक्टर ही कर सकता है और बच्चे पैदा करने के लिए पति-पत्नी (स्त्री और पुरुष) दोनों का स्वास्थ सही होना जरूरी है। किसी एक में कमी होने पे बच्चे पैदा नहीं हो सकते हैं। कोई व्यक्ति यदि ये कहे कि किसी बाँझ औरत को कोई तांत्रिक व्यक्ति बच्चा पैदा कर देगा तो ये सफेद झूंठ है।
दोस्तो ये बातें किसी को आप समझाओ तो वो बुरा मान जाता है क्योंकि वो धर्म के चश्मा में अंधा होता है।
प्यारे दोस्तो,🙏
वो कश्यप जी उसी दिन से प्रिंसिपल साहब से नाराज हो गए और बुराई मान गए और नजरें मिलाना बंद कर गए। कि तुमने झंडा चढ़ाने वाली बात कह कैसे दी???
अब आप ही बताओ कि ऐसे हमारे कश्यप भाइयों का विकास कैसे हो??
ऐसे भाई बड़े-बड़े पदों पे कैसे पहुंचे??
निष्कर्ष:-
मैं मानता हूँ कि धर्म इंसानों को जोड़ने का काम करता है और आस्था से जुड़ा होता है पर इसका मतलब ये कतई नहीं है कि बच्चों की स्कूल की फीस जमा नहीं कर रहे जबकि अमूर्त देवी मां के झंडे चढ़ाने में पचासों हजार खर्च कर रहे हैं।
घर में बैठी मूर्त मां का सम्मान नहीं कर कर रहे हैं, उनकी सेवा नहीं कर रहे और अमूर्त वैष्णों मां, संतोषी मां का भंडारा कर रहे हैं।
घर में बीबी बच्चे भूंखे बैठे हैं और धर्म के नाम पे पैसे लुटा रहे हैं।
मां-बाप को लात मार रहे हैं और झगड़ा कर पैसे लेकर कांवड़ लेने जा रहे।
दोस्तो मेरे हिसाब से ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं है जहां मां-बाप की सेवा नहीं, बीवी बच्चों का ख्याल नहीं पर अमूर्त देवी देवताओं पर पैसे लुटाये जा रहे हैं।
दोस्तो मां बाप की सेवा, बीबी बच्चों प्रति जिम्मेदारी निभाना भी धर्म है और सबसे बड़ा धर्म है।
इसलिए मेरा उन सभी भाइयों को सुझाव है कि पहले घर वाला धर्म निभाएं फिर दूसरा वाला धर्म निभाएं।
देवी देवताओं को जरूर मानें, मंदिर जाएं, कीर्तन करें, जागरण भी करें,कावड़ भी लाएं भंडारा लगाएं पर माता-पिता जोकि पहले भगवान हैं उन्हें पहले माने और उनकी सेवा करें, उनकी इज्जत करें उनकी बात माने। क्योंकि यदि वो नहीं होते तो आप नहीं होते।
घर के खर्चे पहले पूरे करें फिर यदि पैसे बचें तो कहीं भी खर्च करें फिर कोई दिक्कत नहीं है।
एक पिता अपने बच्चों की स्कूल की फीस यदि समय से जमा नहीं करता है तो ऐसी स्थिति में बच्चे को विद्यालय में अपमान सहना पड़ता है। क्योंकि किसी भी विद्यालय में जिन बच्चों की फीस जमा नहीं हुई होती है उन बच्चों को रोज-रोज मास्टर जी असेंबली में खड़ा कर देते हैं और गिल्टी फील कराते हैं जिससे बच्चे का मनोबल टूटता हैं और फिर एक होनहार बच्चा पढ़ाई छोड़ देता है।
इसलिए समाज को बहुत बहुत जागरूक होने की जरूरत है।
हमारे पिछड़े समाज को जगाना है।
क्योंकि समाज को आगे बढ़ाना है।
।।आशू।।
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