बिरादरी के अनेक लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि जागरूकता, प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति और सामाजिक चेतना को मजबूत करने के बजाय कई स्तरों पर उसे कमजोर करने का वातावरण तैयार किया जा रहा है।जब भी किसी वंचित, संसाधन-विहीन या सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग के साथ कोई हिंसात्मक या आपराधिक घटना घटित होती है, तब न्याय की दिशा में निष्पक्ष कार्यवाही होने के बजाय उसे “एडजस्ट” करने, दबाने या मोड़ने की प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती दिखाई देती हैं।

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अक्सर देखा जा रहा है कि यदि कोई व्यक्ति, संगठन या सामाजिक नेतृत्व पीड़ित पक्ष के समर्थन में आवाज उठाता है, तो अपराध और न्याय के मूल प्रश्नों पर चर्चा करने के बजाय उसकी किसी शाब्दिक त्रुटि, भावनात्मक प्रतिक्रिया या पुराने वक्तव्यों को आधार बनाकर उसे ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया जाता है।
कई बार पूरी जाति, समुदाय या समूह की भावनाओं को इस प्रकार उभारा जाता है कि वास्तविक मुद्दा पीछे छूट जाए और न्याय की मांग करने वाला व्यक्ति या समूह अकेला पड़ जाए।

यह भावना लगातार मजबूत हो रही है कि समाज के साथ धोखाधड़ी, भ्रम और विश्वासघात आधारित राजनीति की जा रही है।
सामाजिक मनोबल को तोड़ने, जागरूकता को कुचलने, प्रश्न पूछने वालों को हतोत्साहित करने और संगठित आवाज़ों को विभाजित करने के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष स्तर पर सामूहिक रणनीतियाँ काम करती दिखाई देती हैं।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि प्रभावशाली तंत्रों, संसाधन-संपन्न समूहों और सत्ता-समर्थित नेटवर्कों का अप्रत्यक्ष संरक्षण ऐसे वातावरण को और मजबूत करता है।

जब न्याय की आवाज़ उठती है, तब कई बार अपराध और अन्याय पर चर्चा करने के बजाय जातीय ध्रुवीकरण का खेल शुरू हो जाता है।
एक शब्द, एक प्रतिक्रिया या एक भावनात्मक वक्तव्य को आधार बनाकर पूरी बहस को मोड़ दिया जाता है, ताकि अपराध और उसके पीछे की संरचनात्मक समस्याएँ चर्चा से बाहर हो जाएँ।
इस प्रक्रिया में पीड़ित पक्ष की आवाज़ को दबाने, उसे मानसिक रूप से तोड़ने, सामाजिक रूप से अलग करने और यह एहसास कराने का प्रयास किया जाता है कि “तुम अकेले हो।”

यह भी देखा जा रहा है कि कई बार पीड़ित पक्ष के भीतर से ही महिलाओं, बुजुर्गों, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक संगठनों या भावनात्मक रिश्तों को माध्यम बनाकर दबाव बनाया जाता है, ताकि न्याय की लड़ाई लड़ने वाले लोग टूट जाएँ, समझौता कर लें या पीछे हट जाएँ।
कभी “परिवार”, कभी “समाज की इज्जत”, कभी “महिलाओं का सम्मान”, कभी “समझौते”, कभी “सहायता”, कभी “भाग्य” और कभी “धर्म” के नाम पर भावनात्मक दबाव तैयार किया जाता है।
इस प्रकार पीड़ित वर्ग की नेतृत्वकारी शक्तियों का एक हिस्सा और प्रभावशाली वर्चस्ववादी नेतृत्व — दोनों प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसी व्यवस्था को मजबूत करते दिखाई देते हैं, जो अन्याय और भय के वातावरण को बनाए रखती है।

कई लोगों का मानना है कि जब कोई उभरता हुआ नेतृत्व अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है, तब उसे बदनाम करने, अलग-थलग करने, मानसिक रूप से तोड़ने, कानूनी उलझनों में फँसाने, सामाजिक रूप से अपमानित करने और उसके समर्थन आधार को कमजोर करने के प्रयास तेज हो जाते हैं।
उद्देश्य केवल एक व्यक्ति को रोकना नहीं होता, बल्कि पूरे समाज को यह संदेश देना होता है कि “जो आवाज उठाएगा, उसका भी यही हाल होगा।”

किसी भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था में अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना अपराध नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
चाहे वह आवाज जातीय उत्पीड़न के विरुद्ध उठे, सामाजिक अन्याय के विरुद्ध उठे, या व्यवस्था की विफलताओं के विरुद्ध — उसे दबाने के बजाय सुना जाना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज भावनात्मक उकसावों, जातीय ध्रुवीकरण और आपसी अविश्वास की राजनीति से ऊपर उठकर वास्तविक मुद्दों पर विचार करे —
शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, न्याय तक समान पहुंच, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अवसर और सम्मानजनक भागीदारी जैसे प्रश्नों पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श हो।

कई समाज और वर्ग आज भी आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े हुए हैं।
उनके युवाओं में बेरोजगारी, पलायन, नशे, निराशा और असुरक्षा की समस्याएँ बढ़ रही हैं।
ऐसे में आवश्यकता जातीय टकराव बढ़ाने की नहीं, बल्कि समाज के भीतर जागरूकता, संगठन, वैचारिकी स्पष्टता, संवैधानिक समझ और समाधानात्मक नेतृत्व विकसित करने की है।

समाज को केवल वोट बैंक या भीड़ बनाकर रखने वाली राजनीति नहीं, बल्कि उसे नेतृत्वकर्ता, नीति-निर्माता, शिक्षित, आत्मनिर्भर और सम्मानित नागरिक बनाने वाली सोच की आवश्यकता है।

समय की मांग है कि सभी समाजों के बुद्धिजीवी, जागरूक नागरिक और जिम्मेदार नेतृत्व मिलकर ऐसी सोच विकसित करें जो भय, भ्रम, विभाजन और शोषण से ऊपर उठकर न्याय, पारदर्शिता, संवैधानिक समानता, सामाजिक समन्वय और राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

✍️AKS

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