अब इलाज के लिए बेबस नहीं होंगे गरीब मां-बाप, नवजात बेटियों के लिए सहारा बनेगी ‘नन्ही कली पहल’

Spread the love

70 फीसदी तक इलाज में राहत, देसी ‘नन्ही कली डॉल’ से बेटियों के सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश

अब बागपत में नवजात नन्ही कलियों के लिए उम्मीद, मुस्कान और सुरक्षा का नया अभियान होगा शुरू

बागपत, 15 मई 2026 — घर में नन्ही बच्ची का जन्म हो और कुछ ही घंटों बाद उसकी तबीयत बिगड़ जाए… डॉक्टर तुरंत NICU में भर्ती करने की बात कहें… फिर इलाज का खर्च सुनकर परिवार के चेहरे उतर जाएं। ग्रामीण इलाकों और गरीब परिवारों में यह दर्द आज भी आम है। कई परिवार समय पर इलाज शुरू नहीं करा पाते। कई बार पैसे, जानकारी और सही सुविधा की कमी नवजात बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ जाती है।

बागपत में अब ऐसे ही परिवारों के लिए राहत और उम्मीद की नई शुरुआत होने जा रही है। जिला प्रशासन बागपत और वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अभिनव तोमर की ओर से गरीब और जरूरतमंद परिवारों की बेटियों तथा नवजात बच्चों के लिए संयुक्त रूप से “नन्ही कली पहल” शुरू की जा रही है। यह पहल केवल स्वास्थ्य सुविधा नहीं, बल्कि बेटियों के सम्मान, ग्रामीण परिवारों की चिंता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा अभियान है।

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और बेटियों को स्वस्थ बनाओ” के संदेश के साथ शुरू हो रही इस पहल का शुभारंभ कल सुबह 9:45 बजे डॉ. नरेंद्र कुमार मूर्ति हॉस्पिटल, बड़ौत में होगा। इस अभियान के तहत आर्थिक रूप से कमजोर और बीपीएल परिवारों की बेटियों तथा नवजात बच्चों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और इलाज में बड़ी आर्थिक राहत दी जाएगी।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई परिवार ऐसे हैं जो नवजात बच्चों के इलाज का खर्च सुनते ही घबरा जाते हैं। खासकर तब, जब बच्चे को जन्म के तुरंत बाद NICU या PICU जैसी गंभीर चिकित्सा सुविधा की जरूरत पड़ जाए। कई बार परिवार इलाज शुरू होने से पहले ही बड़े शहरों का रुख करने या अस्पताल पहुंचने में देरी कर देते हैं। ऐसे मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है।

“नन्ही कली पहल” का सबसे बड़ा उद्देश्य यही है कि आर्थिक कमजोरी किसी बच्चे के इलाज में बाधा न बने। इस पहल के तहत Dr. Narendra Kumar Murti Hospital और Aastha Hospital में जांच, भर्ती, इलाज और डॉक्टर परामर्श पर 70 प्रतिशत तक की विशेष छूट दी जाएगी। इसके साथ ही गंभीर रूप से बीमार बच्चों के लिए PICU तथा नवजात बच्चों के लिए NICU उपचार में भी 70 फीसदी तक राहत मिलेगी। जन्म के शुरुआती कुछ घंटे और दिन बच्चों के लिए सबसे संवेदनशील होते हैं। समय पर इलाज और निगरानी मिलने से संक्रमण, सांस लेने में परेशानी, कम वजन और अन्य गंभीर जटिलताओं से बच्चों की जान बचाई जा सकती है। ऐसे में गरीब परिवारों के लिए यह पहल किसी बड़ी राहत से कम नहीं मानी जा रही।

अस्पताल में बनेगा ‘नन्ही कली सहायता काउंटर’

कई बार गरीब परिवार अस्पताल पहुंच तो जाते हैं, लेकिन प्रक्रिया, जांच और इलाज की जानकारी के अभाव में परेशान हो जाते हैं। इसे देखते हुए अस्पताल में विशेष रूप से “नन्ही कली सहायता काउंटर” बनाया जाएगा। यहां आने वाले परिवारों को योजना की जानकारी, उपचार प्रक्रिया और जरूरी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाएगा। प्रशासन का प्रयास है कि जरूरतमंद परिवार इलाज और कागजी प्रक्रिया के बीच भटकने के बजाय आसानी से सहायता प्राप्त कर सकें। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले परिवारों को प्राथमिकता के आधार पर मदद दी जाएगी।

सिर्फ इलाज नहीं, बेटियों के सम्मान का भी संदेश

इस पहल की सबसे खास पहचान “नन्ही कली डॉल” भी होगी। इलाज पाने वाली हर बच्ची को बागपत की पहचान बन चुकी यह देसी गुड़िया मुफ्त दी जाएगी। लेकिन यह सिर्फ एक खिलौना नहीं होगी। यह बेटियों के सम्मान, प्यार और बराबरी का संदेश लेकर आएगी। आज भी समाज के कई हिस्सों में बेटियों को लेकर सोच पूरी तरह नहीं बदली है। ऐसे में प्रशासन इस पहल के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की सबसे बड़ी ताकत हैं। “नन्ही कली” नाम भी बेटियों की मासूमियत, संभावनाओं और उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक बनकर सामने आया है।

“नन्ही कली डॉल” अपने आप में एक अनोखी कहानी भी समेटे हुए है। जिलाधिकारी अस्मिता लाल के जीरो वेस्ट विजन के तहत तैयार की गई यह देसी रैग डॉल वेस्ट प्लास्टिक बोतलों से बने मुलायम रेशों से बनाई जा रही है। आमतौर पर गुड़ियों में रुई भरी जाती है, लेकिन इस गुड़िया में प्लास्टिक बोतलों को विशेष प्रक्रिया से फाइबर में बदलकर इस्तेमाल किया गया है। यानी जो प्लास्टिक कभी पर्यावरण के लिए खतरा माना जाता था, वही अब बच्चों की मुस्कान और सामाजिक संदेश का माध्यम बन रहा है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी यह सोच जिले में काफी सराही जा रही है। इस पहल का एक और मजबूत पक्ष महिला सशक्तिकरण से जुड़ा है। जिले की ग्रामीण महिलाएं अपने हाथों से इन गुड़ियों को तैयार कर रही हैं। कपड़े के टुकड़ों, पुराने फैब्रिक और पुनर्चक्रित सामग्री का उपयोग कर वे “नन्ही कली” को आकार दे रही हैं। इससे महिलाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर भी मिल रहा है। प्रशासन का मानना है कि यह पहल “मिशन शक्ति” और “वोकल फॉर लोकल” जैसे अभियानों को भी मजबूती दे रही है।

दादी-नानी के दौर की देसी गुड़िया फिर लौटी

एक समय गांवों में कपड़े से बनी देसी गुड़िया बच्चों के बचपन का अहम हिस्सा हुआ करती थी। दादी-नानी अपने हाथों से गुड़िया बनाकर बच्चों को देती थीं। धीरे-धीरे बाजार में मशीनों से बने खिलौनों का चलन बढ़ा और यह परंपरा पीछे छूटती चली गई। “नन्ही कली” उसी पुराने अपनापन और देसी संस्कृति को फिर से जीवित करने का प्रयास भी मानी जा रही है। यह बच्चों को अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और स्थानीय पहचान से जोड़ने का माध्यम बन रही है। हाल ही में विश्व चैंपियन मुक्केबाज मैरी कॉम की मौजूदगी में “नन्ही कली डॉल” का भव्य शुभारंभ किया गया था। मैरी कॉम का संघर्ष और सफलता खुद लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा है। उनकी मौजूदगी ने इस पहल को नई पहचान देने का काम किया।

ग्रामीण परिवारों के लिए उम्मीद की पहल

ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच एक बड़ी चुनौती है। कई परिवारों को अच्छे अस्पताल, विशेषज्ञ डॉक्टर और नवजात उपचार सुविधाएं आसानी से नहीं मिल पातीं। आर्थिक कमजोरी और जागरूकता की कमी इस समस्या को और बढ़ा देती है। ऐसे में “नन्ही कली पहल” केवल एक स्वास्थ्य योजना नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए उम्मीद बनकर सामने आ रही है जो अब तक इलाज और खर्च के बीच फंसे रहते थे।

जिला प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य केवल इलाज उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता को मजबूत करना भी है। प्रशासन और चिकित्सकों का मानना है कि स्वस्थ बेटी ही सुरक्षित और मजबूत समाज की नींव होती है। भविष्य में भी इसी प्रकार जरूरतमंद परिवारों के लिए जनहित और स्वास्थ्य से जुड़ी पहलें आगे बढ़ाई जाएंगी। “नन्ही कली पहल” जिले में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच और सामाजिक जागरूकता को नई दिशा देगी।

सूचना विभाग बागपत

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

×