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केशरी दर्पण (Keshari Darpan)

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श्रीरामचरितमानस में शरद ऋतु का वर्णन!

By Keshari Darpan
October 25, 2026 4 Min Read
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रामचरितमानस में बाली वध के बाद सुग्रीव का राज्यभिषेक होता है। सुग्रीव राज काज सम्हालने में व्यस्त हो जाते हैं। इधर प्रभु श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ ऋष्यमूक पर्वत पर ही समय बिताते हैं, तभी वर्षा ऋतु समाप्त हो जाती है और भगवान् श्री राम शरद ऋतु के वर्णन के साथ अपने मन की बात भी कहने से नहीं चूकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास अपने दोहे और चौपाइयों में पहली पंक्ति में तो शरद ऋतु का वर्णन करते हैं, दूसरी पंक्ति में उपमा के माध्यम से मनोभावों को रखते हैं। यह मनोभाव तुलसीदास या भगवान् राम के दृष्टिकोण से देखें तो बिलकुल ही सटीक है। प्रभु श्रीराम अनुज लक्ष्मण से कहते हैं….

बरषा बिगत सरद रितु आई।
लछमन देखहु परम सुहाई॥
फूलें कास सकल महि छाई।
जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई॥

हे लक्ष्मण! देखो, वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद् ऋतु आ गई। फूले हुए कास से सारी पृथ्वी छा गई। मानो वर्षा ऋतु ने ( कास रूपी सफेद बालों के रूप में ) अपना बुढ़ापा प्रकट किया है॥

उदित अगस्ति पंथ जल सोषा।
जिमि लोभहिं सोषइ संतोषा॥
सरिता सर निर्मल जल सोहा।
संत हृदय जस गत मद मोहा॥

अगस्त्य के तारे ने उदय होकर मार्ग के जल को सोख लिया, जैसे संतोष लोभ को सोख लेता है। नदियों और तालाबों का निर्मल जल ऐसी शोभा पा रहा है जैसे मद और मोह से रहित संतों का हृदय!॥

रस रस सूख सरित सर पानी।
ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥
जानि सरद रितु खंजन आए।
पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए॥

नदी और तालाबों का जल धीरे-धीरे सूख रहा है। जैसे ज्ञानी ( विवेकी ) पुरुष ममता का त्याग करते हैं। शरद ऋतु जानकर खंजन पक्षी आ गए। जैसे समय पाकर सुंदर सुकृत आ सकते हैं ( पुण्य प्रकट हो जाते हैं )।

पंक न रेनु सोह असि धरनी।
नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥
जल संकोच बिकल भइँ मीना।
अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना॥

न कीचड़ है न धूल ? इससे धरती ( निर्मल होकर ) ऐसी शोभा दे रही है जैसे नीति निपुण राजा की करनी! जल के कम हो जाने से मछलियाँ व्याकुल हो रही हैं, जैसे मूर्ख ( विवेक शून्य ) कुटुम्बी ( गृहस्थ ) धन के बिना व्याकुल होता है॥

बिनु घन निर्मल सोह अकासा।
हरिजन इव परिहरि सब आसा॥
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी।
कोउ एक भाव भगति जिमि मोरी॥

बिना बादलों का निर्मल आकाश ऐसा शोभित हो रहा है जैसे भगवद्भक्त सब आशाओं को छोड़कर सुशोभित होते हैं। कहीं-कहीं ( विरले ही स्थानों में ) शरद् ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा हो रही है। जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं॥

चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि I
जिमि हरि भगति पाइ श्रम तजहिं आश्रमी चारि॥

( शरद् ऋतु पाकर ) राजा, तपस्वी, व्यापारी और भिखारी ( क्रमशः विजय, तप, व्यापार और भिक्षा के लिए ) हर्षित होकर नगर छोड़कर चले। जैसे श्री हरि की भक्ति पाकर चारों आश्रम वाले ( नाना प्रकार के साधन रूपी ) श्रमों को त्याग देते हैं॥

सुखी मीन जे नीर अगाधा।
जिमि हरि सरन न एकऊ बाधा॥
फूलें कमल सोह सर कैसा।
निर्गुन ब्रह्म सगुन भएँ जैसा॥

जो मछलियाँ अथाह जल में हैं, वे सुखी हैं, जैसे श्री हरि के शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती। कमलों के फूलने से तालाब कैसी शोभा दे रहा है, जैसे निर्गुण ब्रह्म सगुण होने पर शोभित होता है॥

गुंजत मधुकर मुखर अनूपा।
सुंदर खग रव नाना रूपा॥
चक्रबाक मन दुख निसि पेखी।
जिमि दुर्जन पर संपति देखी॥

भौंरे अनुपम शब्द करते हुए गूँज रहे हैं तथा पक्षियों के नाना प्रकार के सुंदर शब्द गूंज रहे हैं। रात्रि देखकर चकवे के मन में वैसे ही दुःख हो रहा है, जैसे दूसरे की संपत्ति देखकर दुष्ट को होता है॥

चातक रटत तृषा अति ओही।
जिमि सुख लहइ न संकर द्रोही॥
सरदातप निसि ससि अपहरई।
संत दरस जिमि पातक टरई॥

पपीहा रट लगाए है, उसको बड़ी प्यास है, जैसे श्री शंकरजी का द्रोही सुख नहीं पाता ( सुख के लिए झीखता रहता है ) शरद् ऋतु के ताप को रात के समय चंद्रमा हर लेता है, जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं॥

देखि इंदु चकोर समुदाई।
चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई॥
मसक दंस बीते हिम त्रासा।
जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा॥

चकोरों के समुदाय चंद्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी लगाए हैं जैसे भगवद्भक्त भगवान्‌ को पाकर उनके ( निर्निमेष नेत्रों से ) दर्शन करते हैं। मच्छर और डाँस जाड़े के डर से इस प्रकार नष्ट हो गए जैसे ब्राह्मण के साथ वैर करने से कुल का नाश हो जाता है॥

भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
सदगुर मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥

( वर्षा ऋतु के कारण ) पृथ्वी पर जो जीव भर गए थे, वे शरद् ऋतु को पाकर वैसे ही नष्ट हो गए जैसे सद्गुरु के मिल जाने पर संदेह और भ्रम के समूह नष्ट हो जाते हैं॥

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Keshari Darpan

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