।। शरद पूर्णिमा महारास महामहोत्सव ।।
महारास अर्थात एक ऐसा महोत्सव जिसमें स्वयं ब्रह्म द्वारा जीव को अपने ब्रह्म रस में डुबकी लगाने का परम सौभाग्यशाली अवसर प्रदान किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पूर्ण ब्रह्म हैं तो असंख्य गोपियाँ वो साधक हैं जिन्होंने अपने सर्वस्व का त्याग कर केवल उन पूर्ण ब्रह्म का वरण किया है।
शास्त्रों में कहा गया है कि रसो वै स: अर्थात परमात्मा रस स्वरूप हैं अथवा जो चराचर जगत में रस तत्व है, वही परमात्मा है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उसी आनंद रूप रस का असंख्य गोपिकाओं के मध्य वितरण ही तो रास है। जीवन के अन्य सभी सांसारिक रसों का त्याग कर जीव द्वारा ब्रह्म के साथ ब्रह्मानन्द के आस्वादन का सौभाग्य ही महारास है।
काम तभी तक जीव को सताता है जब तक जीव जगत में रहे। जगदीश की शरण लेते ही उसका कामभाव स्वतः तिरोहित हो जाता है। श्रीमद् भागवत जी ने कहा कि जीव का जो साधन, काम को मिटाकर राम से मिला दे, वही महारास है।
शरद पूर्णिमा महारास महामहोत्सव आप सभी के लिए शुभ एवं मंगलमय हो।